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आम जीवन-यात्रा का सचेत लेखाकार

ोलकाता दूरदर्शन के फिल्म डिविजन में नौकरी करनेवाले फिल्मकार जोसी जोसेफ की एक बड़ी खासियत यह है कि वह अपने अंदर जी रहे इंसान को कभी सोने नहीं देते। उसे लगातार जगाए रख वे उससे अपने पास-पड़ोस के हलचल के साथ ही समाज में अत्याचार और उत्पीड़न की आंखें खोल देनेवाली घटनाओं को दर्ज करवाते हैं। फिर अपने कैमर की मदद से उसे लोगों के सामने परफेक्ट तरीके से परोसने की कोशिश भी करते हैं। कमोबेश उनकी सभी कृतियां साबित करती हैं कि जोसेफ महा पेशे की वजह से एक फिल्मकार भर नहीं, बल्कि आम लोगों की जीवन-यात्रा के एक सचेत लेखाकार भी हैं। अब तक करीब दो दर्जन फिल्में बना चुके जोसी जोसेफ से मेरा परिचय तब तक नहीं था, जब तक उन्होंने वन डे फ्रॉम ए हैंगमैन्स लाइफङ नहीं बना ली थी। यह फिल्म 14 अगस्त 2004 को बलात्कार और हत्या के आरोप में कोलकाता में फांसी पर लटकाए गए धनंजय चटर्ाी के गले में मौत का फंदा डालनेवाले जल्लाद नाटा मल्लिक पर आधारित थी। इस फिल्म के जरिए जोसेफ ने लोगों के सामने जो कुछ परोसने की कोशिश की है, वह यह कि कैसे नाटा मल्लिक के लिए धनंजय की फांसी का दिन भी कुछ वैसा ही था, जसे उसकी जिंदगी के अन्य दिन। फिल्मकार ने दिखाने की कोशिश की है कि कैसे उस दिन भी जल्लाद नाटा मल्लिक की इंसानी संवेदनशीलता पर रोटियों का मोल भारी पड़ रहा था। यह भी कि कैसे उस दिन जल्लाद नाटा मल्लिक के दिमाग में केवल धनंजय का वजन, उसे सफलता के साथ फांसी के फंदे पर लटकाने की योजना व तैयारी तथा इसके बदले अधिक से अधिक पैसे बना लेने की चिंता ही चक्कर काट रही थी। वह फिल्मकार से भी अधिक से अधिक माल ऐंठ लेना चाहता है, क्योंकि उसे मालूम है कि यही सही वक्त है जब वह पैसे बना सकता है। किसी की मौत की गवाही और कहानी बेच कर। यह अलग बात है कि जोसेफ की वह फिल्म बंगाल में प्रतिबंधित कर दी गई, तथापि वह हारनेवाले इंसान नहीं। वह लगातार एक सचेत पहरूए की तरह समाज की पहरदारी कर रहे हैं, अपनी कृतियों के माध्यम से जीवन की जरूरतों व मूल्यों में हो रहे परिवर्तनों के गवाह बन रहे हैं। जोसी जोसेफ की कृतियों से ऐसा नहीं लगता कि उन पर कभी किसी खास भौगोलिक क्षेत्र का कोई असर रहा हो। उन्होंने अपने जन्मस्थल केरल व कर्मस्थल बंगाल से सैकड़ों मील दूर उत्तर प्रदेश (यूपी) के आजमगढ़ के गरीब व छोटे-छोटे किसानों की कथा-व्यथा का जो सजीव चित्रण अपनी फिल्म वॉकिंग डेडङ में किया है, उसकी जितनी भी तारीफ की जाए, कम होगी। इस फिल्म में वे वहां की समाज व्यवस्था पर करारा प्रहार करते हुए दिखाते हैं कि कैसे यूपी के एक गांव का एक गरीब किसान जमीन के एक छोटे से टुकड़े में कमरतोड़ मेहनत कर चंद महीनों के लिए ही अन्न उपजा पाता है। जब उसे लगता है कि इससे साल भर की जिंदगी नहीं चलनेवाली, तो निराश-हताश हो वह परदेश की राह पकड़ता है। चंद महीनों तक परदेश में पसीने बहा कर जब गांव को लौटता है, तो पाता है कि जिस धरती की सेवा उसने अपनी मां की तरह की, उस पर एक दबंग पड़ोसी काबिज हो चुका है। कब्जे की प्रक्रिया की खानापूर्ति करने के लिए परदेश गए जमीन के असली हकदार को मृत करार दिया जा चुका होता है। किसान हाड़-मांस की काया में भले ही जी रहा होता है, पर कागजों में उसकी मृत्यु की औपचारिकता उसकी मौत से पहले ही पूरी कर दी गई होती है। जोसेफ अपनी फिल्म के जरिए दिखाते हैं कि कैसे यह कुछ लोगों के लिए सामान्य सी बात हो गई है। आम भारतीय जिंदगी पर अत्यंत सूक्ष्मता के साथ नजर लगाए जोसेफ के कैमर ने ‘सफर-ार्नी ऑफ ऐन इंडियन फार्मर’ में सर्वश्रेष्ठ किसान का पुरस्कार लेने के लिए सरकारी टिकट पर भुवनेश्वर से दिल्ली के बीच राजधानी एक्सप्रेस के फर्स्ट क्लास कंपार्टमेंट में यात्रा करते किसान को अत्यंत जीवंत तरीके से कैद किया है। किसान के लिए पूरी यात्रा चकाचौंध भरी है। ऐसा लगता है मानो दिल्ली में बैठे भगवान के कलियुगी अवतारों के आशीर्वाद से वह चंद घंटों के लिए स्वर्ग के ही एक हिस्से में गोते लगा रहा हो। ट्रेन के अंदर बर्थ, खिड़कियों के शीशे, पर्दे, एयरकंडिशनिंग की सुविधा की तो बात ही और है, वह ट्वॉयलेट तक पर मुग्ध है। वह किसका उपयोग कैसे कर, यह समझने में ही बार-बार उलझता दिख रहा है। अपनी इस कृति में जोसेफ दिखाना चाहते हैं कि कैसे देश के प्रमुख शहरों के बीच दौड़ती राजधानी एक्सप्रेस ट्रेनों की यात्रा देश के हक व हित में रो कमरतोड़ मेहनत करते एक किसान के लिए आज भी किसी सपने से कम नहीं है। वे आगे चल कर भी अपनी ऐसी ही दूसरी नई कृतियों से एक अत्यंत सचेत इंसान, फिल्मकार व समाज-व्यवस्था के जिम्मेवार लेखाकार के रूप मेंखुद को और मजबूती के साथ स्थापित करने के अतिरिक्त फिल्म निर्माण कला को भी बहुत कुछ देने की क्षमता रखते हैं, यह सोचना किसी भी तरह बेमानी नहीं है।

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