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बुंदेलखंड के तालाबों को निगल रही 'जलकुंभी'

कभी बुंदेलखंड की पहचान तालाबों और जलाशयों की बदौलत हुआ करती थी, लेकिन अब जैसे यह गुजरे जमाने की बात हो गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि यहां के लोग बुजुर्गो की धरोहर को सहेज नहीं पाए और इन तालाबों को 'जलकुंभी' निगल गई। तालाबों और जलाशयों का गंदा पानी जानवरों के भी इस्तेमाल के काबिल नहीं बचा।

डेढ़ दशक पूर्व बुंदेलखंड के बाशिंदे गांव की बस्ती में बने तालाबों के पानी का इस्तेमाल नहाने के अलावा पेयजल के रूप में भी किया करते थे, लेकिन सरकारी पेयजल व्यवस्था (हैंडपम्प) आने के बाद धीरे-धीरे तालाबों का उपयोग बंद हो गया।

अब हालात यह हैं कि इंसान ही नहीं, जानवर भी पानी पीने के लिए तालाब में उतरना पसंद नहीं करते। मानव समाज की अनदेखी और सरकारी उपेक्षा के चलते बुजुर्गों के बनवाए तालाबों में जलकुंभी नामक जलपौध का कब्जा हो गया है। लिहाजा, किसी जमाने में विशाल और बड़े जलाशयों की अब सिर्फ शिनाख्त मात्र बची रह गई है। इसके उदाहरण के तौर पर बांदा जिले के तेंदुरा गांव की बस्ती से लगे तीन तालाबों को लिया जा सकता है।

इस गांव की आबादी करीब दस हजार के आस-पास है। गांव की बस्ती से लगे बाबा तालाब, नया तालाब व विजयी तालाब कभी गांव के लोगों की प्यास बुझाने का मुख्य जरिया हुआ करते थे। लेकिन अब इन तालाबों का पानी जानवर भी नहीं पीते।

इस गांव के बुजुर्ग मना महराज गौतम बताते हैं, ''गांव में बने बाबा तालाब को राम जानकी मंदिर के पहले महंत हीरादास ने खुदवाया था। समूचे गांव के लोग इस तालाब के पानी का उपयोग अरहर की दाल पकाने में किया करते थे।'' वह बताते हैं कि अब गांव के लोगों के घरों का  गंदा पानी तालाब में जा रहा है। साथ ही जलकुंभी की वजह से तीन चौथाई तालाब पट गया है।

पानी वाले बाबा के नाम से चर्चित जल पुरुष राजेंद्र सिंह के शिष्य और 'नदी बचाओ-तालाब बचाओ' आंदोलन के संयोजक सुरेश रैकवार इसी गांव के रहने वाले हैं। रैकवार बताते हैं, ''गांव के पूर्व की बस्ती में बने नया तालाब के सफाई अभियान का उद्घाटन करने वर्ष 2005 में खुद राजेंद्र सिंह आए थे। उनकी अगुआई में गांव के करीब सौ लोगों के श्रमदान से इस पूरे तालाब की जलकुंभी साफ की गई थी, लेकिन बाद में गांव पंचायत या प्रशासन की अनदेखी की वजह से तालाब फिर उसी हाल में पहुंच गया है।''

रैकवार ने बताया कि 'नदी बचाओ-तालाब बचाओ' आंदोलन चलाकर ग्रामीणों के सहयोग से बांदा, महोबा, हमीरपुर व झांसी के तीन दर्जन तालाबों की सफाई कराई जा चुकी है। लेकिन बाद में इन धरोहरों को सहेजने वाले आगे नहीं आए। वह बताते हैं कि तकरीबन हर गांव के तालाबों पर जलकुंभी का अतिक्रमण हो चुका है।

सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो बुंदेलखंड में 5,490 तालाब हैं, जिनके पानी का उपयोग पेयजल के लिए होता रहा है। लेकिन ग्रामीणों के अवैध कब्जे और जलकुंभी के प्रभाव से अब तालाब और जलाशय लुप्त होने के कगार पर हैं।

बांदा जिले में तैनात मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) प्रमोद शर्मा का कहना है, ''तालाबों की खुदाई और रखरखाव की जिम्मेदारी मनरेगा की धनराशि से ग्राम पंचायतों को सौंपी गई है। यदि पंचायतें गंभीर नहीं हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।''

कुल मिलाकर सरकारी अधिकारियों और ग्रामीणों की अनदेखी से बुजुर्गों के धरोहर कहे जाने वाले तालाबों का यही हाल रहा तो अगली पीढ़ी को तालाबों की कहानियां ही किताबों में पढ़ने को मिलेंगी।

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