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तीसरे मोर्चे की उलझी दास्तान

जिस दिन भाजपा के वरिष्ठ नेताओं और आम आदमी पार्टी ने तीसरे मोर्चे की संभावनाओं को नकारा, उसी दिन ग्यारह दलों के नेता ‘थर्ड फ्रंट’ को साकार करने में सफल रहे और ‘एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम’ के तहत भावी रणनीति बनाने की घोषणा भी की। निस्संदेह, इस गठबंधन का तात्कालिक प्रभाव यह दिखा कि सरकार सदन में सांप्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक पेश नहीं कर पाई, क्योंकि प्रमुख विपक्षी पार्टी के साथ ये पार्टियां इकट्ठी हो गई थीं। लेकिन संसद के अंदर बना ‘तीसरा मोर्चा’ क्या संसद के बाहर सीटों के बंटवारे तथा चुनावी रैलियों और अन्य राजनीतिक परिदृश्यों में एकजुट रह पाएगा? यहां ‘हां’ कहना कठिन है, क्योंकि इसके पक्ष में यह तर्क जाता है कि चुनाव पूर्व ‘तीसरे मोर्चे’ का गठन यह गारंटी नहीं देता कि चुनाव के बाद भी गठजोड़ कायम रहेगा। अतीत में हम ऐसी स्थिति देख चुके हैं। ऐसे में, मौजूदा तीसरे मोर्चे को ‘लचर गठजोड़’ के तौर पर देखा जाना चाहिए, क्योंकि एक तो इस समय भारतीय राजनीति में पहले से ही दो गठबंधन संप्रग और राजग हैं, जिनमें शामिल होने के विकल्प क्षेत्रीय पार्टियों के पास हैं, और दूसरा कि फिलवक्त यह तीसरा मोर्चा इन 11 सियासी पार्टियों के मुफीद तो हैं, किंतु ऐसा नहीं कि जयललिता तमिलनाडु में या आगे किसी संभावना में नीतीश कुमार को रास्ता देंगी या फिर इसका उल्टा होगा।

यह भी नहीं होने जा रहा है कि देवेगौड़ा की पार्टी को जयललिता तमिलनाडु में सीटें देंगी। ये सब अपने-अपने क्षेत्र के क्षत्रप हैं और अगले 15 दिनों तक संसद के अंदर आपसी समन्वय से काम करेंगे। लेकिन बाहर अपने हितों की रक्षा में वे एक-दूसरे के आमने-सामने भी हो सकते हैं। इन पार्टियों के नेताओं को यह मोर्चा जंचता है, तो इसके कई और अलग-अलग कारण हैं। जयललिता को लगता है कि इस गठबंधन में शामिल होकर उनकी छवि ‘प्रगतिशील’ बनेगी। इसके लिए वह कुछ सीटें वाम दलों को दे देंगी। गौर करने वाली बात यह है कि उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में करीब-करीब प्रोजेक्ट किया गया है। इस कारण तमिलनाडु में एआईएडीएमके को अधिक सीटें मिलने की संभावना है, वहां के लोगों को लग रहा है कि डीएमके के अंदरूनी झगड़ों से अच्छा मुख्यमंत्री जयललिता के साथ जाना होगा, क्योंकि उनकी नेता प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार मानी जा रही हैं। जहां तक नीतीश कुमार का प्रश्न है, तो बिहार में उनका ग्राफ नीचे जाता दिखता है, क्योंकि कांग्रेस राजद और लोजपा के साथ गठबंधन करने जा रही है। ये दोनों संप्रग के घटक पहले भी रहे हैं।

ऐसे में, जदयू को भी कुछ अतिरिक्त सहायता चाहिए, जो एक फ्रंट का हिस्सा बनकर मिल जाएगा। कर्नाटक में देवेगौड़ा के जद (एस) की स्थिति पतली है। वहां उसका मुकाबला कांग्रेस बनाम भाजपा से होगा। दो राज्य ही ऐसे हैं, जहां कांग्रेस की स्थिति आगामी लोकसभा चुनाव में भी सुदृढ़ रहने की संभावना है। उनमें असम के अलावा कर्नाटक है। विधानसभा चुनाव और उप-चुनाव में भी जद (एस) कमबैक नहीं कर पाई। इसलिए उसे भी गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपाई गठबंधन की तलाश थी। वाम दल पुराने झटकों से बहुत ज्यादा उबरते हुए नहीं दिखते हैं। चुनावी विश्लेषण और सर्वेक्षण बताते हैं कि ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल, यानी अपने गढ़ में और मजबूत होंगी। यह भी कहा जा रहा है कि कोलकाता जैसे शहर में नरेंद्र मोदी बढ़त बनाएंगे, सीटें न सही, तो कम से कम आठ-दस फीसदी वोट तो ले जाएंगे ही। इसलिए वाम दलों को एक बड़े मंच की जरूरत सबसे अधिक थी। उत्तर प्रदेश से मुलायम सिंह यादव के लिए भी अच्छी खबरें नहीं हैं।

मुजफ्फरनगर दंगे के बाद कहा जा रहा है कि उनका मुस्लिम जनाधार दरक गया है। समाजवादी पार्टी कहती है कि संप्रग सरकार को उसका समर्थन बाहरी और मुद्दों पर आधारित है। इसलिए वह मौजूदा सरकार विरोधी लहर में अपने लिए लाभ की स्थिति चाहती है। इस तरह ‘तीसरा मोर्चा’ बन जाता है। लेकिन मान लें कि आम चुनाव में भाजपा को 200 सीटें मिलती हैं, तब क्या यह मोर्चा कायम रह पाएगा? जाहिर है, नहीं। इसलिए यह कहना ज्यादा उपयुक्त होगा कि 16वीं लोकसभा का गणित ही तय करेगा कि आगे क्या होता है। एक ही फैक्टर है, जो इस थर्ड फ्रंट को वास्तविक बना सकता है। वह है, आप फैक्टर। इसमें कोई दोराय नहीं कि मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में आम आदमी पार्टी, यानी आप नई ताकत है। मोदी के रथ को रोकने की स्थिति में यही पार्टी है, दिल्ली विधानसभा चुनाव में हम यह देख चुके हैं। लेकिन इसके लिए अगले दो-तीन हफ्ते महत्वपूर्ण होंगे।

देखना होगा कि क्या यह पार्टी आगे गलतियां करती है या नहीं। यदि आम आदमी पार्टी गलतियां नहीं करती है, 350 सीटों पर उम्मीदवार उतारती है और करीब छह प्रतिशत वोट ले जाती है, विशेष रूप से उन सीटों पर, जहां वह सब कुछ दांव पर लगाती है, तो 30 सीटें हासिल कर सकती है। यह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तक मानते हैं। इसके अलावा, यदि बाकी सीटों पर वह ‘वोटकटवा’ बनती है और भाजपा को नुकसान पहुंचाती है, और फायदा क्षेत्रीय दलों को मिलता है, तो तस्वीर अलग होगी। मान लें कि वह कुछ सीटें जीतती हैं और कुछ पर वोट काट लेती है और ‘आम आदमी प्रभाव’ औरों को जिता देता है, तो भाजपा को 40 सीटों का नुकसान हो सकता है।

उस संदर्भ में क्षेत्रीय पार्टियां इकट्ठी होकर और मौजूदा तीसरे मोर्चे में थोड़े-बहुत जोड़-घटाव से सरकार बना लेंगी, कांग्रेस उसे समर्थन देगी। वैसे, सब कुछ अगर-मगर में है, क्योंकि संप्रग और राजग की मजबूती भी एक विषय है। राजग के घटक शिवसेना और अकाली दल तो फिलहाल कहीं जाते हुए नहीं दिख रहे हैं। साथ ही, इस गठबंधन से टीडीपी और इंडियन नेशनल लोकदल जुड़ सकते हैं। दूसरी तरफ, संप्रग से एनसीपी चुनाव-पूर्व नहीं टूटेगी। गैर-कांग्रेस और गैर-भाजपा गठबंधन का आगे आना एक अलग मुद्दा है और ठीकठाक सीटें हासिल करने के बाद उसके बीच से एक सर्व-सम्मत नेतृत्व चुनना दूसरा मुद्दा है। यही इस मोर्चे के लिए सबसे मुश्किल काम होगा। तब अगर सभी क्षत्रपों को कोई मंजूर होता है, तो वह शरद पवार होंगे। वह एनसीपी के अध्यक्ष हैं। यह पार्टी फिलहाल संप्रग में है, किंतु महाराष्ट्र में कांग्रेस से मोल-तोल की खातिर अन्य विकल्पों पर काम कर रही है। हालांकि, गड़बड़ यह है कि महाराष्ट्र में एनसीपी अच्छा करती नहीं दिख रही है। तब बीजू जनता दल के नवीन पटनायक सर्वमान्य हो सकते हैं। जयललिता तो खुद को सर्वमान्य मान ही रही हैं। उधर, मायावती भी अपनी दावेदारी रखेंगी। इस खुले खेल में कांग्रेस यही चाहेगी कि मोदी का रथ रुके और ऐसी खिचड़ी सरकार बने, जिसे वह बाद में देखेगी।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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