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इस सामाजिकता पर सवाल उठाना जरूरी

परंपरागत मीडिया यानी पत्र-पत्रिकाओं और टेलीविजन के मुकाबले सोशल मीडिया बहुत बड़े दायरे तक ‘अपनी  बात कहने’ का मौका देता है। कभी-कभी यह दीये को तूफान के मुकाबले भी खड़ा कर सकता है। बेशक, एक हद तक इसमें लोकतांत्रिक रवैया दिखता है। लेकिन जो ताकतवर है, वह अक्सर इसे भी मैनिपुलेट कर लेता है। लोकतंत्र में सार इससे आता है कि आप क्या कहते हैं? कैसे कहते हैं? इस क्या और कैसे का जवाब, सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से लेकर, विचार-संस्कार तक से जुड़ता है। मुजफ्फरनगर के दंगे की आग में सोशल मीडिया ने जिस तरह घी डालने का काम किया। करीब दो साल पहले असम में बोडो-मुस्लिम झड़पों के बाद देश भर में, खासतौर पर शहरों में पूर्वोत्तर के लोगों को असुरक्षित करने और फिर बड़े पैमाने पर उनका पलायन कराने में भी सोशल मीडिया की भूमिका दर्ज हुई थी। फिर भी, समस्या इन प्रत्यक्ष ‘दुरुपयोगों’ से कहीं बड़ी है। यह सबसे कटे हुए अकेले मनुष्य की दुनिया है। एक गहरी विडंबना में ‘कहने’ की प्रकटत: सामाजिक क्रिया, यहां इस हद तक एकांतिक हो जाती है कि यहां सामान्य सामाजिक-सांस्कृतिक विधि-निषेध भी स्थगित हो जाते हैं।

नतीजा यह कि यह ‘कहना’ बहुत बार सपने-सी अवचेतन क्रिया से लेकर, सार्वजनिक शौचालयों के कुंठापूर्ण दीवार लेखन के बीच झूलता हुआ नजर आता है। जाहिर है, इसके पीछे सबसे बढ़कर इसका एहसास काम रहा होता है कि हमें कोई देख नहीं रहा है। अचरज नहीं कि पश्चिमी देशों में अब गंभीरता से यह पुरानी सीख बाकायदा याद दिलाई जा रही है कि पहले सोचें, फिर बोलें और जरूरी हो, तभी बोलें! महात्मा गांधी की शहादत के दिन, यानी 30 जनवरी को एक लोकप्रिय वेबसाइट पर दर्ज की गई प्रतिक्रियाओं के उदाहरण से यह चिंता आसानी से समझ में आ जाएगी। उस दिन इस वेबसाइट पर प्रतिक्रिया दर्ज कराने वालों का प्रचंड बहुमत गांधी की हत्या के पक्ष था। गांधी की हत्या को बुरा और गांधी को भला कहने वालों के मुकाबले, तीन गुना ज्यादा लोगों का कहना था कि गोड्से ने गांधी को मारकर अच्छा किया था। यह भी कहा गया कि ‘यह काम बहुत पहले हो जाना चाहिए था।’ महात्मा गांधी के काम की आलोचना और महात्मा गांधी के काम करने के तरीके की आलोचना हमारे लिए कोई नई चीज नहीं है।

नाथूराम गोड्से की तारीफ करने वाले भी यदा-कदा दिखाई दे जाते हैं। असली समस्या है ऐसी प्रतिक्रियाओं से झलकने वाली हिंसा और नफरत फैलाने वाली भावना। जाहिर है, यह लोकतांत्रिक तो नहीं ही है, एक सभ्य समाज की भी निशानी नहीं है। ऐसी प्रतिक्रियाएं अगर संगठित रूप से और बहुत ज्यादा अनुपात में आ रही हैं, तो इसका अर्थ है कि सोशल मीडिया की सामाजिकता पर निरंतर सवाल उठाते रहने का समय आ गया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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