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क्या 254 किलोवॉट की ग्रोथ कम है

अक्सर यह शिकायत की जाती है कि करने के नाम पर आम आदमी शिकायत के अलावा कुछ नहीं करता। खराब सड़क से लेकर रसोई के खराब कुकर तक वह हर चीज के लिए सरकार को ही जिम्मेदार मानता है। अगर उसकी भैंस भी कम दूध देने लगे, तो उसे लगता है कि यह सरकार की नीतियों से हतोत्साहित है। ऐसे में, जब मैं टेलीविजन पर भारत निर्माण से जुड़े विज्ञापन देखता हूं, तो बड़ी तसल्ली होती है। यहां हर कोई अपनी जिंदगी से बड़ा खुश दिखता है। मनरेगा का गुणगान करते हुए गांव वाले जब खुशी का बखान करते हैं, तो लगता है कि अभी वहां एक लंबी-सी काली गाड़ी आकर रुकेगी और बाहर निकलकर एक युवा बताएगा कि कैसे मैंने दिहाड़ी में मिलने वाले 145 रुपयों की भारी रकम से सेविंग करके कल ही यह बीएमडब्ल्यू एकमुश्त खरीदी है।

यह देखकर मन खुशी से झूम उठता है कि आवास योजना के तहत जो मकान मिले ही नहीं, उनके जश्न में उन्होंने अभी से एक गाना कंपोज कर लिया है, जिसे पूरा का पूरा गांव नाचते हुए कोरस में गा रहा है। असल जिंदगी में लोग भले ही दो करोड़ की लॉटरी पर भी खुश न होते हों, मगर विज्ञापनों के परम संतोषी यह जानने पर ही हैरानी में बड़ा-सा मुंह खोलकर ‘अच्छा’ बोलते हैं, जब कोई उन्हें बताता है कि चाचा, हमारे यहां भी राष्ट्रीय पोषाहार सहायता कार्यक्रम शुरू हो रहा है। यह सब देखते-पढ़ते ही मैं आत्मग्लानि से भर जाता हूं। सोचता हूं कि शायद मैं भी ज्यादा डिमांडिंग हूं।

मुझे भी खुशी का मौका तलाशना होगा। तभी मेरी नजर अखबार के ऐसे ही एक विज्ञापन पर पड़ती है, जो बता रहा है कि सरकार के अथक प्रयासों से प्रतिव्यक्ति बिजली की खपत 559 किलोवॉट से बढ़कर अब 813 किलोवॉट हो गई है। पढ़ते ही मैं आत्मविश्वास से भर जाता हूं। अब कोई पूछेगा कि नीरज, इन वर्षों में तुमने कितना ग्रो किया, तो बता दूंगा.. 254 वॉट! थोड़ा और आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए मैं टीवी चलाता हूं, मगर तभी लाइट चली जाती है और मैं एक बार फिर से अंधेरे में चला जाता हूं। मगर तसल्ली है कि मेरे 254 किलोवॉट अब भी मेरे पास सुरक्षित हैं।

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