DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

कमलेश्वर से कुछ यों मिले

कोई किसी के नजदीक पहुंचता है, तो पैदा होते समय लिस्ट लेकर नहीं आता। कोई न कोई कारक तत्व होता है, जो दो जनों को नजदीकी देता है। एक ‘अनुदान’ का रास्ता है और दूसरा पुरुषार्थ का। पुरुषार्थ की डगर कठिन जरूर होती है, मगर जब सड़क पर उतरोगे, तो आंखें नीची करके नहीं, तनकर चल पाओगे। इसी संदर्भ में कमलेश्वर से मिलना हुआ था। 1972 का वाकया है। हम फाइन आर्ट्स के छात्र थे। हमारे अध्यापक ने एक दिन कहा- अपनी डगर अभी से तय कर लो। हम हरिश्चंद्र घाट पर स्केच कर रहे थे। चाय पीने का मन कर रहा था, लेकिन खीसा खाली था। हमने अपनी दोस्त साधना से उधार मांगा- दस रुपये दे दो। उसने कहा, पिछला तो लौटाए नहीं, दस और दे दूं, क्या करोगे? इसमें दो चाय आएगी, एक तुम पीना, एक हम। बाकी से बड़ा चित्रकार बनूंगा।

बहरहाल, हमने चाय पी और बाकी बचे पैसे को लेकर हम पोस्ट ऑफिस की तरफ बढ़ गए, जितने भी स्केच थे सब के सब श्री कमलेश्वर जी, संपादक सारिका  के पते पर रवाना कर दिया और लग गए रोजमर्रा की जिंदगी में। उन दिनों काशीनाथ सिंह विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे। एक दिन लंका पर मिल गए। बोले- अरे भाई बधाई, तुम तो सारिका में छाए हुए हो। तब हमें याद आया कि हमने जो चित्र भेजे थे, शायद छपा हो। पर सारिका  खरीदी कैसे जाए? इस बार हमने दीदी (सुमीता चक्रवर्ती, प्रसिद्ध मूर्तिशिल्पी) से उधार लिए और सारिका देखा, तो अपने पर यकीन नहीं। इस तरह से कमलेश्वर जी से मुलाकात हुई और दूर तक चली।
अपनी फेसबुक वॉल पर चंचल

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:कमलेश्वर से कुछ यों मिले