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संघ पर सवाल

इन दिनों एक अंग्रेजी पत्रिका में छपा लेख चर्चा में है, जो देश के कई हिस्सों में हुए बम विस्फोटों के आरोपी स्वामी असीमानंद के कई इंटरव्यू पर आधारित है। इस काफी लंबे लेख में जो बात सबसे ज्यादा विवादों में है, वह असीमानंद का एक बयान है, जिसके मुताबिक उनके काम की सर-संघचालक मोहन भागवत को पूरी जानकारी थी और ये सब उन्हीं के समर्थन से हुए हैं। असीमानंद ने कहा है कि मोहन भागवत गुजरात के आदिवासी इलाके डांग में वनवासी कल्याण आश्रम में उनसे मिलने आए थे, जहां उन्होंने बम विस्फोट करने की योजना पर चर्चा की थी। तब मोहन भागवत ने यह कहा था कि उनका आशीर्वाद और समर्थन उनके साथ है, लेकिन वह इसमें सीधे शामिल नहीं होंगे। उन्हें यह ध्यान रखना होगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम इससे कहीं न जुड़े। असीमानंद संघ से जुड़े वनवासी कल्याण आश्रम के बड़े पदाधिकारी थे और दो बार उन्हें संघ ने गुरु गोलवलकर के नाम पर स्थापित पुरस्कार भी दिया है। इसलिए संघ उनसे पीछा छुड़ा तो नहीं सकता था, लेकिन असीमानंद ने यह भी बताया है कि कैसे उन्होंने सार्वजनिक रूप से संघ के नेताओं के साथ दिखना बंद कर दिया।

इस बात पर राजनीतिक पार्टियों की प्रतिक्रिया तय लाइन पर ही हुई है। अपनी-अपनी विचारधारा के मुताबिक कुछ लोगों ने इस बात पर संघ की आलोचना की है और कुछ ने इसे राजनीतिक षडय़ंत्र बताया है। संघ का नाम इसके पहले भी महात्मा गांधी की हत्या से लेकर सांप्रदायिक हिंसा की कई घटनाओं में उछला है, लेकिन हर बार उसके पास कुछ-न-कुछ बचाव रहा है। संघ का मुख्य बचाव यह होता है कि जो व्यक्ति इन वारदात में पकड़े गए, वे संघ से अलग हो गए थे। आरएसएस के संगठन के स्वरूप की वजह से इस तरह का दावा करना आसान भी होता है। असीमानंद के बारे में ऐसा दावा करना इसलिए मुश्किल है, क्योंकि वह संघ और उसकी संस्थाओं से बहुत गहरे जुड़े हुए हैं। लेकिन बड़ी समस्या यह है कि अगर बड़े लोग इन षड्यंत्रों में शामिल हैं, तो उनके खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाकर उन्हें कानूनन सजा मिलनी चाहिए, वरना इतना घातक और संवेदनशील मुद्दा राजनीतिक लाभ-हानि का एक मोहरा बनकर रह जाता है। हमारे देश में कानून को बनाए रखने वाली मशीनरी इतनी कमजोर और अक्षम है कि अक्सर बड़े लोगों के नाम आने पर वह बच निकलने में ही खैर समझती है।

इस प्रकरण में भी यह बताया गया है कि जांच एजेंसियों के पास संघ के बड़े लोगों के शामिल होने की जानकारी थी, लेकिन ऊंचे स्तर पर जांच को स्वामी असीमानंद और प्रज्ञा सिंह ठाकुर के स्तर पर सीमित करने का फैसला किया गया। धार्मिक कट्टरता और आतंकवाद किसी भी तरह के हों, वे खतरनाक हो सकते हैं और उन्हें राजनीतिक औजार बनाना घातक है। स्वामी असीमानंद ने जो बातें इंटरव्यू में कही हैं, वे सारी उन्होंने जांच एजेंसियों को भी बताई हैं, क्योंकि उनके मुताबिक उन्हें अपने किए का पछतावा नहीं, बल्कि गर्व है। उनके इंटरव्यू में कई ऐसे सूत्र हैं, जिन पर शायद जांच एजेंसियों ने आगे काम नहीं किया। इस बात की संभावना शायद अब भी ज्यादा नहीं है कि जिन लोगों ने असीमानंद जैसों को तैयार किया, उन्हें पकड़कर कानून के दायरे में ला सके। हो सकता है कि असीमानंद, प्रज्ञा सिंह ठाकुर और कुछ लोगों को सजा हो जाए और यह मामला खत्म कर दिया जाए। इतने साल में सबूतों का बचे रहना तकरीबन नामुमकिन हो जाता है। लेकिन असीमानंद इस बात का उदाहरण हैं कि कैसे किसी का आदर्शवाद हिंसक और अमानवीय रूप धारण कर सकता है।

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