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काठमांडू में गरमाई राजनीति

सीपीएन-यूएमएल पार्लियामेंटरी पार्टी के मुखिया के रूप में के पी ओली के चुनाव के साथ ही अब पार्लियामेंट के भीतर तीनों बड़ी पार्टियों को अपना-अपना नेता मिल गया है। इसके साथ ही सरकार बनाने की प्रक्रिया भी तेज हो गई है। पार्लियामेंटरी बिजनेस एडवाइजरी कमिटी ने प्रधानमंत्री के चुनाव के लिए अगले सोमवार, यानी 10 फरवरी की तारीख मुकर्रर की है। इन तमाम घटनाक्रमों के बावजूद नई सरकार की रूपरेखा क्या होगी, यह अब भी साफ नहीं है। ज्यादातर पार्टियां अब तक अपने संगठन के भीतर ही सलाह-मशविरे में जुटी रही हैं और अब तक किसी बड़ी पार्टी ने यह साफ नहीं किया है कि गठबंधन सरकार में साझीदारी के मसले को वह किस तरह से सुलझाएगी। लेकिन अब उन्हें एक-दूसरे से समझौते की प्रक्रिया तेजी से पूरी करनी पड़ेगी।

हाल के वर्षों में इस तरह के समझौतों में काफी वक्त लगते देखा गया है। ऐसे में, चंद दिनों के अंदर दो बड़ी पार्टियों का समझौते के उस बिंदु तक पहुंचना, जो कि दोनों के लिए संतोषजनक हो, बेहद मुश्किल काम है। हालांकि, नेपाली कांग्रेस और यूएमएल, दोनों ने कहा है कि वे साथ-साथ काम करने को लेकर प्रतिबद्ध हैं, लेकिन वास्तव में दोनों पार्टियों के नेता एक-दूसरे पर हावी होने की कोशिश में जुटे हुए दिखे। दोनों के नेताओं ने यह साफ किया है कि उनकी पार्टी सत्ता में अपनी स्थिति से कोई समझौता नहीं करेगी। इन दोनों बड़ी पार्टियों के बीच बढ़ते परस्पर संदेह की पृष्ठभूमि में ओली का यूएमएल संसदीय दल का नेता चुना जाना समस्या बढ़ाने वाला है, क्योंकि ओली का तेवर हमेशा एक ‘विरोधी’ का रहा है। ऐसे में, नेपाली कांग्रेस से समझौते में दिक्कतें पेश आ सकती हैं। यदि संविधान को तैयार करने का काम तय समय में पूरा करना है, तो इसके लिए सबसे पहले एक स्थिर सरकार की जरूरत होगी। हालात को देखते हुए सबसे बेहतर विकल्प यही है कि एक सर्वसम्मत सरकार बने, जिसमें यूसीपीएन (माओवादी) और मधेसी पार्टियां भी शामिल हों। लेकिन अगर दो बड़ी पार्टियां मिलकर सरकार बना लेती हैं और बाकी को विपक्ष में बैठना पड़ता है, तो यह कतई सुखद नहीं होगा।
द काठमांडू पोस्ट, नेपाल

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