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राजनीति का गिरता स्तर

इस बार भारी संख्या में युवा वोट करेंगे और उनका मुद्दा होगा, भ्रष्टाचार दूर करो। लेकिन जिस निम्न स्तर की घृणित राजनीति शुरू हुई है, वह अफसोस करने लायक है। पहले मुजफ्फरनगर दंगे पर संकीर्ण राजनीति, फिर व्यक्ति विशेष पर टीका-टिप्पणी और अब सांविधानिक पदों पर बैठे लोगों द्वारा ही संविधान को न मानना। सत्ता प्रतिष्ठान में बैठने वाले कुछ भी बोलने से पहले मर्यादा का ध्यान नहीं रखते। आलोचना राजनीति का एक अभिन्न अंग है, पर स्वस्थ आलोचना का दौर अब खत्म-सा हो गया है। सपा, बसपा और खास तौर पर कांग्रेसी नेताओं ने तो भाषायी मर्यादा की सभी हदें पार कर दी हैं। आप और भाजपा, जैसी कुछ पार्टियों से स्वस्थ राजनीति की उम्मीद की जा सकती है, पर इनके नेता भी कई मौकों पर अपनी भाषायी सीमा लांघ जाते हैं। आप की तो पूरी राजनीति ही दूसरों को भ्रष्ट और खुद को ईमानदार बताने पर टिकी है।
शिवम भट्ट, लखीमपुर, उत्तर प्रदेश
shivam.bhattlmp@gmail.com

विज्ञान में हम

प्रकाशित संपादकीय ‘विज्ञान और भारत’ में विज्ञान की समस्याओं को रेखांकित करने का ईमानदार प्रयास हुआ। लेकिन समस्याएं इससे इतर भी हैं। भारतीय विज्ञान कांग्रेस के उद्घाटन के मौके पर प्रधानमंत्री ने ऐसी कोई बात नहीं कही, जो पहले कही न गई हो। साल-दर-साल विज्ञान सम्मेलनों में हम यही सब तो सुनते आए हैं। एक तरह से प्रधानमंत्री का भाषण रस्म-अदायगी था। अगर ऐसा कुछ नहीं होता, तो विज्ञान के क्षेत्र में हम बहुत आगे होते। हालांकि, प्रधानमंत्री ने मौजूदा वक्त में विज्ञान व तकनीक की पढ़ाई और शोध का जो महत्व बताया, उससे कोई इनकार नहीं कर सकता। हम यह न भूलें कि विज्ञान विकास एवं प्रगति का साधन है। अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, रूस, इंग्लैंड, चीन इसी के बूते हमसे आगे हैं। हमें भुखमरी, गरीबी, तंगहाली, बेरोजगारी और बीमारी से निजात पाना है, तो विज्ञान को अपनाना होगा।
एस शंकर सिंह, द्वारका, दिल्ली
singhsshankar@gmail.com

आरक्षण और विरोध

कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने जाति के आधार पर कोटा खत्म करने की मांग की है। उनकी मांग स्वागत के योग्य है। यह मांग तो बहुत पहले ही की जानी चाहिए थी। सरकार को चाहिए कि सभी सरकारी और गैर-सरकारी कार्यालयों में नौकरी के लिए जाति आधारित आरक्षण का प्रावधान पूरी तरह से खत्म कर दे। इतना ही नहीं, नगर निगमों, राज्यों की विधानसभाओं और संसद से भी जाति आधारित कोटा खत्म कर देना चाहिए। इससे केवल योग्य व्यक्तियों के शासन में आने की संभावनाएं बढेंगी। वैसे भी व्यक्ति आरक्षण तो पा लेता है, परंतु स्वयं को मुख्यधारा से कटा हुआ महसूस करता है। जाति आधारित आरक्षण की जगह आर्थिक आधार पर आरक्षण को लाने का अब समय आ गया है।
सुरेंद्र गोयल, रोहिणी, दिल्ली
surendergoel16@gmail.com

मुद्दों में भी पक्षपात

लोकसभा चुनाव के निकट आते ही राजनीति गरम हो चुकी है। लेकिन समझ में नहीं आ रहा कि राजनीति में पक्षपात है या राजनीतिक मुद्दे भी पक्षपात करते हैं। विडंबना देखिए, कश्मीर की स्वायत्तता तो मुद्दा है, परंतु शरणार्थी शिविरों में रह रहे कश्मीरी मुद्दा नहीं हैं। इसी तरह, एक परिवार का बलिदान मुद्दा बनता है, पर नरसंहार नहीं। दंगे मुद्दे बन जाते हैं, पर पुनर्वास की व्यवस्था नहीं। बांग्लादेश से आते शरणार्थी मुद्दा हैं, पर इससे त्रस्त पूर्वोत्तर मुद्दा नहीं है। किसे बोडो समुदाय की चिंता है? किसे पूर्वोत्तर के उत्थान की चिंता है? किसे जम्मू एवं कश्मीर में तैनात हमारे जवानों की चिंता है? किसे देश के युवाओं की चिंता है? किसे हमारे बुजुर्गों की चिंता है? ऐसे मुद्दे सियासी पार्टियों के पास नहीं होते, लेकिन जिन मुद्दों से विवाद हो और एक खास वर्ग का समर्थन मिले, उनके बारे में राजनीतिक पार्टियां खूब चिंता करती हैं या जताती हैं।
सतीश भारद्वाज, मवाना
sat.nitu@gmail.com

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