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गांव की गलियों से निकल बनी जूडो खिलाड़ी

 हिन्दुस्तान संवाद अलीगढ़। कहते हैं प्रतिभाओं के रास्ते कितनी भी बाधा हो, वे अपना रास्ता तलाश ही लेती हैं। कुछ ऐसा ही करने को बेताब गांव की गलियों से निकलकर सृष्टि उपाध्याय जूडो खिलाड़ी बनकर अपने साथ जिले का नाम रोशन करने की तैयारी कर रही हैं। स्काउट में 13 पदक झटकने के साथ ही जिला, मंडल और प्रदेश स्तर पर जूडो में उन्होंने अपने दमखम से लोगों को दांतो तले उंगलियां दबाने पर मजबूर कर दिया है।

बस अब वे राष्ट्रीय स्तर पर एक मुकाम बनाने की तैयारी में जुटी हुई हैं। इग्लास के गांव चंदफरी की रहने वाली सृष्टि उपाध्याय एक मध्यम वर्गीय परिवार से संबंध रखती हैं। उनके पिता राजेन्द्र प्रसाद उपाध्याय रोडवेज में कंडक्टर और माता नीरू उपाध्याय आंगनबाड़ी कार्यकत्री हैं। महेश्वर गर्ल्स इंटर कॉलेज में 11वीं की छात्रा सृष्टि ने अपने सपनों को पंख लगाना तबसे शुरू कर दिया था, जब वे कक्षा छह में पढ़ती थीं। उन्होंने शौक-शौक में स्काउट गाइड की राह पकड़ ली।

बस फिर क्या था स्काउट में तो आगे बढ़ती ही गईं। स्काउट में अब तक वे 13 पदक अपने नाम कर चुकी हैं। यहां से उनकी रुचि खेलों की ओर बढ़ी और उन्होंने कबड्डी खेलना शुरू कर दिया। साल 2010 में जिला, मंडल और फिर प्रदेश स्तर पर कबड्डी में पदक झटकने के बाद उनका चयन नेशनल के लिए हो गया। लेकिन उन्होंने वहां प्रतिभाग नहीं किया। साल 2011 में स्काउट में उन्हें हैदराबाद में राज्यपाल पुरस्कार भी मिल चुका है।

यहां से उनका रुझान जूडो के खेल की ओर बढ़ा और फिर क्या था, हाथ-पैर चलाते हुए उन्होंने गांव की गलियों को पार कर लिया और लगातार आगे बढ़ती चली गईं। उन्होंने जिले और मंडल स्तर पर स्कूलों में हुई कई प्रतियोगतिाओं में खुद को एक मुकाम तक पहुंचा दिया। उनका चयन प्रदेश की टीम में हुआ। अब उनकी तैयारी जूडो में नेशनल स्तर पर प्रतिभाग करने की है। सृष्टि ने बताया कि वे तीन भाई बहन हैं। उनका सपना है कि वे भविष्य में एक अच्छी जूडो खिलाड़ी बनें और फिर कोच बनकर बच्चों को जूडो सिखाएंगी।

उन्होंने बताया कि वे अगर कोच नहीं बनीं तो एक अच्छा वकील बनेंगी और समाज में महिलाओं के उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाकर उनकी रक्षक बनेंगी।

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