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आसान नहीं बहुमत की राह

लोकसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। सत्ता के दोनों प्रमुख दावेदार दल कांग्रेस व भाजपा मोर्चा संभाल चुके हैं। क्षेत्रीय दल भी अपनी ताकत के साथ बहुकोणीय मुकाबला बनाने की तैयारी में हैं। बता रहे हैं रामनारायण श्रीवास्तव

राजनीतिक दलों के अपने चुनावी आकलन व विभिन्न एजेंसियों के चुनावी सर्वेक्षणों से माहौल गरमाने लगा है। बीते पांच सालों में सत्तारूढ़ कांग्रेस के गढ़ दरकते दिख रहे हैं, वहीं पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में मिली सफलता से भाजपा के हौसले बुलंद हैं। भाजपा को मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान व गुजरात से बड़ी सफलता मिलने की उम्मीद है तो कांग्रेस विपरीत हालात के बावजूद आंध्र प्रदेश, असम, केरल व उड़ीसा में अपनी पूरी ताकत झोंके हुए है। लेकिन दोनों दलों के बीच असली घमासान उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र व कर्नाटक में होना है। इन चार राज्यों के परिणाम ही सोलहवीं लोकसभा की तस्वीर साफ करेंगे।

हर राज्य का माहौल और समीकरण अलग है। उत्तर प्रदेश में सपा व बसपा के साथ कांग्रेस व भाजपा में घमासान है। बिहार में नये गठबंधन बने हैं। भाजपा व जद (यू) अलग हो चुके हैं, मगर माहौल में भाजपा जद (यू) की बजाय ज्यादा लाभ की स्थिति में है। कांग्रेस, राजद व लोजपा के मजबूत गठबंधन की तैयारी हो रही है। राज्य की सभी 40 सीटों पर कम से कम त्रिकोणीय मुकाबला तय है। कर्नाटक भाजपा की कमजोर कड़ी है और कांग्रेस यहां लाभ की स्थिति में है। महाराष्ट्र में दोनों प्रमुख दलों के गठबंधनों के बीच एक बार फिर कांटे का मुकाबला है। इन चारों राज्यों में लोकसभा की 196 सीटें हैं।

कांग्रेस की रणनीति के हिसाब से असम, केरल व ओडिशा ही सबसे ज्यादा ठीक हैं। आंध्र प्रदेश में तेलंगाना की वजह से वह बुरी तरह जूझ रही है। इन राज्यों में लोकसभा की 97 सीटें हैं। यहां पर उसे भाजपा की बजाय क्षेत्रीय व अन्य दलों से चुनौती मिल रही है। कांग्रेस को सबसे ज्यादा दिक्कत दिल्ली, उत्तराखंड व हरियाणा में हो रही है। यहां पर उसे सबसे ज्यादा नुकसान होने की आशंका है। हालांकि कांग्रेस के एक प्रमुख रणनीतिकार का कहना है कि विरोधी दल जो हव्वा खड़ा कर रहे हैं, हालात उतने खराब नहीं हैं। अभी भी केवल कांग्रेस ही सही मायने में राष्ट्रीय दल है और इसका लाभ उसे मिलेगा।

दूसरी तरफ भाजपा के मजबूत गढ़ गुजरात, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश व राजस्थान हैं। उसे इनमें अपनी ताकत बरकरार रखते हुए अन्य राज्यों से ज्यादा से ज्यादा सीटें बटोरनी की चुनौती है। इन राज्यों में कुल लोकसभा सीटें सिर्फ 91 हैं, जिनसे लोकसभा का 272 का जादुई आंकड़ा बहुत दूर है। ऐसे में उसकी उम्मीदें उत्तर प्रदेश व बिहार पर सबसे ज्यादा टिकी हैं। वहां पर भी वह किसी गठबंधन की बजाय अपने दम पर व मोदी के नाम पर सफलता की उम्मीद कर रही है। टीम मोदी के एक अहम सदस्य का कहना है कि हम सबसे बड़े दल बनेंगे ही। इस बार कांग्रेस विरोधी माहौल है, जिसका लाभ भाजपा को मिलेगा। भाजपा झारखंड के साथ दिल्ली पर भी कड़ी नजर रखे है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी के चलते भाजपा व कांग्रेस दोनों ही परेशान हैं। विधानसभा चुनावों के नतीजों ने यहां पर दोनों दलों की नींद उड़ा दी है।
अन्य राज्यों में हिमाचल प्रदेश में भाजपा व कांग्रेस में सीधा व बराबरी का मुकाबला है। जम्मू कश्मीर में भाजपा घाटी के बाहर ही लड़ाई में होगी, जहां सिर्फ  दो सीटें हैं। यहां कांग्रेस व नेशनल कांफ्रेंस के गठबंधन की परीक्षा होगी। पंजाब में भाजपा अकाली गठबंधन व कांग्रेस में ही मुकाबला होगा। क्षेत्रीय दलों के वर्चस्व वाले तमिलनाडु व पश्चिम बंगाल में कांग्रेस व भाजपा दोनों के लिए चुनौती है। भाजपा के लिए खाता खोलना ही चुनौती है, जबकि कांग्रेस किसी तरह कुछ सीटें झटकने की कोशिश करेगी।

भाग्य तय करेंगे ये राज्य
लोकसभा चुनाव 2014 के लिए देश के दो बड़े दल भाजपा और कांग्रेस कमर कस चुके हैं। इन दलों का भाग्य तय करने में अहम रहने वाले
12 प्रदेशों का एक जायजा।
91 सीट इन चार राज्यों की, भाजपा के लिए हैं अहम। दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव में इन तीन राज्य छत्तीस गढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में भाजपा ने सरकार बनाई। एक साल पहले विस चुनाव में वह फिर गुजरात में सत्ता में आई है।
97 सीट इन चार राज्यों की, कांग्रेस के लिए होंगी अहम।
कांग्रेस के लिए असम, आंध्र प्रदेश और केरल से अच्छी खबर आ रही है। ओडिशा से भी उत्साहवर्धक खबर है।
196 सीट इन चार राज्यों के दोनों दलों के लिए अहम होंगी।
देश के दो सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश और बिहार में इन दोनों दलों को बेहतर करने की उम्मीद रहेगी। इनमें महाराष्ट्र और कर्नाटक को भी जोड़ सकते हैं।
भारत 543 लोकसभा में निर्वाचित होकर कुल इतने प्रतिनिधि आते हैं।

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