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ताकि फिर ऐसी जरूरत न पड़े

ऑपरेशन ब्लू स्टार से जुड़ी जो नई बातें हमारे सामने आ रही हैं, उन्हें मैं दो संदर्भों में देखता हूं। पहला, ये मीडिया के विभिन्न माध्यमों से आ रही हैं। मीडिया-रिपोर्ट सूत्रों के आधार पर तैयार होती हैं। मीडिया रिपोर्ट खुलासों के आधार पर बनती हैं। मीडिया रिपोर्ट बयानों के रूप में भी सामने आती हैं। साथ ही, इनमें अफवाहों व दुष्प्रचारों का भी कुछ हद तक अंश मुमकिन है। ऐसे में, बड़े मामलों में रिपोर्ट तब तक विश्वसनीयता नहीं पाती है, जब तक कि उसकी आधिकारिक पुष्टि दोनों तरफ के ऐसे विश्वस्त और उच्च अधिकारी न कर दें, जिन्हें सर्वोच्च प्रभाव प्राप्त हो। दूसरा संदर्भ, ये जो खबरें हम तक आ रही हैं, वे दरअसल टुकड़ों-टुकड़ों में और अस्पष्ट रूप से आ रही हैं। इस स्थिति में रिपोर्ट की तमाम कड़ियों को सिलसिलेवार तरीके से जोड़ना असंभव प्रतीत होता है और कई संदेह तथा सवाल भी खड़े होते हैं। जैसे, इसी मामले में यह समझ में नहीं आ रहा है कि किसने पहल की और क्या-क्या सलाह दी गई, वगैरह-वगैरह। यदि यह बात सच है कि ऑपरेशन ब्लू स्टार में ब्रिटेन की कोई भूमिका थी, तब भी कई रहस्योद्घाटन बाकी रह जाते हैं। इसलिए मौजूदा घटनाक्रमों और रिपोर्ट की वस्तु-स्थिति को देख-जानकर भी मैं किसी निष्कर्ष तक पहुंचना नहीं चाहता, विशेष रूप से तब तक, जब तक कि सारी बातें स्पष्ट न हो जाती हैं।

बहरहाल, इस मामले में ब्रिटेन से जो खबरें आ रही हैं, उनसे यह तथ्य उभरकर सामने आता है कि ऑपरेशन ब्लू स्टार की योजना बनाने में अपने ‘सहयोग’ को ब्रिटेन स्वीकार करता है। यदि यह बात सही है, तो मेरे विचार से यह ‘सहयोग’ मधुर निजी-संबंधों की बुनियाद पर मुमकिन हो पाया होगा, क्योंकि तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के रिश्ते ब्रिटेन में अपनी समकक्ष मार्गरेट थैचर से बड़े अच्छे और आत्मीय थे। थैचर अपनी किताब द पाथ टु पावर में इंदिरा के व्यक्तित्व और नेतृत्व की प्रशंसा करती हैं और ‘आपसी गहरी समझ’ पर सहमति जताती हैं। अन्यथा, विश्व या भारत के इतिहास में सामान्यत: यह नहीं दिखता है कि एक संप्रभु राष्ट्र घरेलू मामलों में दूसरे देश से परामर्श अथवा सहयोग मांगता या लेता है। खास तौर पर ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर यह उम्मीद नहीं की जाती है। कूटनीति में भी किसी स्तर पर इस तरह के सलाह या हस्तक्षेप का कोई प्रावधान नहीं है। भविष्य में इस तरह के मामले नहीं आने चाहिए। इस घटना को सिर्फ ‘विपथगमन’ के रूप में देखा जा सकता है या ‘सामान्य व्यवहार से विचलन’ के रूप में।

भारत अभी आम चुनाव के मुहाने पर है। ऐसे में, यह रहस्योद्घाटन मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को प्रभावित कर सकता है। यह इस मामले का एक अलग पक्ष है। लेकिन यदि खबर सच्ची है, तो इसका दूसरा पक्ष यह है कि कोई तीन दशक पहले ऑपरेशन ब्लू स्टार को अंजाम दिया गया था और समझने की जरूरत यह है कि यह घटना बीत चुकी है। जैसे हम इस तथ्य से पीछा नहीं छुड़ा सकते, उसी तरह ‘ब्रिटिश मदद’ को भी खारिज करके नहीं चल सकते। ऐसे में, प्रासंगिक यह है कि इस मामले की जांच हो। भारत में यह जांच होनी चाहिए कि किन परिस्थितियों में वह ‘सलाह’ ली गई और कैसे इसे होने की अनुमति दी गई।

हालांकि, इस घटना या जांच की अनुमति देने से भारत-ब्रिटेन संबंधों में कोई फर्क आने वाला नहीं है। फर्क तब आता है, जब दो देशों के बीच का संबंध ‘किसी न किसी रूप में एकतरफा’ हो। भारत-ब्रिटेन संबंध द्विपक्षीय है और कई मोर्चों और संगठनों के स्तर पर बहुपक्षीय भी। यह ‘पारस्परिक संबंधों’ की बुनियाद पर टिका हुआ है। सत्ता-परिवर्तन की स्थिति में भी यह संबंध बना रहेगा। यह भी गौरतलब है कि सरकारें बदलती हैं, विदेश नीति नहीं।

इसके अलावा, यदि हम मीडिया-रिपोर्ट के कथित शब्द ‘सीमित सैन्य सलाह’ को समझने की कोशिश करें, तो यहां यह बताने की जरूरत पड़ती है कि भारत की विदेश नीति में या अन्य देश के साथ किसी तरह के अपने संबंध में ऐसा कोई ‘टर्म’ है ही नहीं। वैसे भी यह वह मामला है, जहां भारत खुद कदम उठाने में, यानी ऑपरेशन को अंजाम देने में सक्षम था। हम यह न भूलें कि राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में यह देश समर्थ रहा है। इसलिए इस मामले में ‘सीमित सैन्य सलाह’ मांगने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। ‘सीमित सैन्य सलाह’ या ‘सैन्य सलाह’ की आवश्यकता तब पड़ती है, जब एक देश अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा में खुद को सामथ्र्यवान नहीं पाता है। हाल के समय में ऐसे कई उदाहरण विदेशी जमीनों पर दिखे हैं, जिनमें वहां के लोकतंत्र की रक्षा या इंसानी हकों की हिफाजत के लिए किसी अन्य देश ने किसी रूप में सहयोग दिया हो। लेकिन स्वतंत्र भारत के पास सम्माननीय और उच्च कौशल-युक्त सैन्य-शक्ति हमेशा से रही है। ऐसे में, ‘विदेशी सैन्य सलाह’ की बात खारिज हो जानी चाहिए। जहां तक मैं समझ पा रहा हूं और ब्रिटेन के विदेश मंत्री विलयम हेग ने जो कहा है, उससे यह जाहिर होता है कि ऑपरेशन ब्लू स्टार में ब्रिटेन की भूमिका ‘सीमित’ और ‘बिल्कुल सलाहकार की’ थी और योजना के शुरुआती चरण में यह सलाह दी गई थी। दूसरे अर्थो में, ब्रिटेन यह कह रहा है कि वास्तविक अभियान में उसकी कोई भूमिका नहीं थी। साथ ही, ब्रिटेन के विदेश मंत्री का बयान यह भी स्पष्ट नहीं करता कि ‘सीमित’ और ‘बिल्कुल सलाहकार’ की भूमिका के तौर पर दी गई ‘सलाह’ को क्या तत्कालीन भारत सरकार ने माना था या नहीं? इस तरह के खुलासे अभी नहीं हुए हैं। जिस तरह से बताया जा रहा है कि काफी दस्तावेज के अध्ययन के बाद ब्रिटेन की तरफ से यह बयान आया है, तो मुङो लगता है कि और स्पष्टता के लिए भारत में भी यह मुद्दा जांच का विषय है। बहरहाल, इस मुद्दे में जिस र्ढे पर चीजें गईं, उसमें यही कूटनीतिक राय बनती है कि उस समय विदेश नीति के व्यवहारों से हटकर काम हुआ था और भविष्य में ऐसी घटना न घटे, इसे अब सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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