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भारत को आधुनिक रक्षा तंत्र बनाने का रास्ता

आजादी के साढ़े छह दशक बाद भी हम कोई लड़ाकू विमान नहीं बना सके। बयानों में बार-बार ‘स्वदेशी’ पर जोर दिया जाता है। फिर भी ऐसा न हो पाने का एक कारण है, सैन्य-सामान की खरीद में रिश्वत के स्वार्थ का छिपा होना। हथियार बेचने वाली कंपनियों को ब्लैक लिस्ट करना तो बस नाटक है। राजनेताओं व नौकरशाहों की लालफीताशाही द्वारा सैन्य-सामान की खरीद-प्रक्रिया जान-बूझकर पेचीदा व थकाऊ बनाई गई है, ताकि ज्यादा धांधली हो सके। ऐसा मालूम होता है कि मुख्य उद्देश्य सैन्य-क्षमता बढ़ाना नहीं, बल्कि रिश्वतखोरी को पक्का करना है। यह भी विस्मयकारी है कि हमारे देश ने मंगल मिशन की सफल शुरुआत की या क्रायोजेनिक इंजन तकनीक में कामयाबी पाई, किंतु यह आधुनिक राइफल या पिस्टल बनाने में अक्षम है। हथियार खरीद में भारत की 80 फीसदी तक बढ़ती निर्भरता के कई कारण हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा इकाइयों और निजी क्षेत्र के बीच प्रतिस्पर्धी माहौल बनाने की बजाय रक्षा मंत्रालय सार्वजनिक क्षेत्रों में संसाधनों की बरबादी को नजरअंदाज करता है। सच्चाई यही है कि अंतरिक्ष यान, क्रायोजेनिक इंजन, हल्के लड़ाकू विमान, अजरुन टैंक या मिसाइल तंत्र में विदेशी मदद से हासिल उपलब्धि है। स्वदेशी तोप ‘अर्जुन’ में भी 55 फीसदी तक विदेशी कल-पुर्जे हैं। आलोचक भी मानते हैं कि आत्म-निर्भर होने तक विदेशी तकनीक के इस्तेमाल में शर्म की बात नहीं है।

आधुनिक रक्षा उद्योग तंत्र के निर्माण की कुंजी यह है कि इसमें नई और उन्नत तकनीक को शामिल किया जाए। अमेरिका की ड्रोन-क्षमता से दुनिया अभिभूत है और यह देश अब इसे पानी में भी उतार रहा है। इसलिए इस दिशा में भारत को अपनी सुस्त चाल बंद करनी होगी। लेकिन सवाल उठता है कि कैसे? जवाब है कि विदेशी कंपनियों के साथ निजी क्षेत्रों के संयुक्त उपक्रम को बढ़ावा देकर। विदेशी कंपनियां आकर्षक निवेश के साथ इच्छुक हैं। यदि भारत अपने निजी क्षेत्र को इसके लिए प्रोत्साहित करता है और कम से कम दो संयुक्त उपक्रम शुरू हो जाते हैं, तो छोटे हथियारों की आपूर्ति की दिशा में यह पर्याप्त कदम होगा। आगे यदि भारत सरकार की तरफ से इन्हें मदद मिली, तो एक दिन ऐसा आएगा कि हम मित्र-देशों को छोटे हथियार बेचेंगे। युवा शक्ति के सही इस्तेमाल से यह मुमकिन है।

भारत को हथियारों के ग्लोबल फैक्टरी हब और इसकी सप्लाई चेन से जुड़ने के बारे में भी सोचना चाहिए। यह अहम है, क्योंकि कोई भी देश सभी क्षेत्रों में अपने लिए हथियार नहीं बना सकता। प्रमुख यूरोपीय एयरोस्पेस के सामान कई देशों में बनते हैं। इसी तरह, अमेरिकी कंपनियां यूरोप से सामान लेती हैं। हमें भी अपने जैसे देशों के साथ संसाधनों को बांटना चाहिए। हमारे विकल्प पश्चिम से लेकर इजरायल, रूस और जापान तक खुले हुए हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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