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क्रांति है पुकारती, तू सुन रहा जवान है..

भारतीय अपनी लेट-लतीफी के लिए जाने जाते हैं। इसका एक और प्रमाण सामने आया है कि भारत अब क्रांति के मुहाने पर खड़ा है। जब सारी दुनिया में क्रांतियां हो चुकीं, बल्कि प्रतिक्रांतियां भी इतिहास में दर्ज हो गईं, तब भारत में क्रांति ने दस्तक दी है। बल्कि क्रांति के दरवाजे पर भारत ने दस्तक दी है। अब भारत में क्रांति होकर रहेगी। इसकी वजह यह है कि देश जिन नेताओं की ओर उम्मीद से देख रहा है, वे सब क्रांतिकारी हैं। अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी दिन में पचासों बार क्रांति की बात करती है। राहुल गांधी एक ही इंटरव्यू में इससे भी ज्यादा व्यवस्था-परिवर्तन की बात करते हैं। नरेंद्र मोदी और उनके समर्थक विनम्र व अल्पभाषी लोग हैं, इसलिए वे क्रांति की बात नहीं करते, लेकिन अंदर से वे दृढ़-संकल्प हैं कि देश में क्रांति करनी है। अब क्रांति बचकर कहां जाएगी?

जिस व्यवस्था को उलटकर क्रांति करनी है, उसे कौन चला रहा है? व्यवस्था का चेहरा हैं मनमोहन सिंह, जिन्होंने घोषित कर दिया है कि वह आम चुनाव के बाद रिटायर हो जाएंगे। जब व्यवस्था रिटायर हो जाएगी, तो क्रांति टेकओवर कर लेगी। वैसे मनमोहन सिंह रिटायर जैसे ही हैं, उन्हें कोई कह दे कि जरा इस कुरसी से उठकर बगल की कुरसी पर बैठ जाएं, तो वह मान लेंगे। अब क्रांति के लिए परिस्थितियां अनुकूल हुई हैं।

कुछ यथास्थितिवादी सवाल पूछ रहे हैं कि देश को क्रांति की जरूरत है भी या नहीं? क्रांतिकारी यह सवाल न पूछते हैं, न इसका जवाब देते हैं। क्रांति जब होती है, तो वह होती है, उसकी जरूरत हो या न हो। यथास्थिति भी कोई हमसे पूछकर नहीं रही, क्रांति भी पूछकर नहीं होगी। अब ऐसी क्रांति होगी कि हर ओर क्रांतिकारी होंगे, सरकार में क्रांतिकारी, विपक्ष में क्रांतिकारी और भी कोई जगह हो, तो वहां भी। व्यवस्था में बदलाव और क्या होता है?

यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि जब क्रांति आए, तो पुराने क्रांतिकारी यह न कहें कि हमने तो इस क्रांति को पहचाना ही नहीं। जनाब, यह पुराने स्टाइल की क्रांति नहीं है, इसलिए अब आपके सामने जो भी है, उसे क्रांति मान लीजिए, यही सेफ है।

 

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