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सुल्ताना डाकू की दास्तान

आकाशवाणी नजीबाबाद के गेस्ट हाउस में टेलीविजन नहीं है। यह मेरे लिए राहत की बात है। तड़के उठा, तो ड्राइवर न जाने कहां गाड़ी लगाकर सो रहा था, इसलिए मित्र की बाइक से चाय पीने निकला। पांच रुपये की ऐसी जायकेदार चाय शायद सिर्फ यहीं मिलती है। मुङो लगा कि यहां सुल्ताना डाकू द्वारा रोपित मूल्य संहिता अभी तक विद्यमान है। सुल्ताना डाकू यहां के वनिकों को समय-समय पर मूल्य वृद्धि और घट-तौली के विरुद्ध चेताता रहता था। जो न मानते, उन्हें उठवा लेता था। जहां पर मैं रुका हूं, वहां से तीन किलोमीटर दूर सुल्ताना डाकू का किला है। गदर के बाद रूहेलखंड के मुस्लिमों पर अंग्रेजों की गाज अधिक गिरी। कई किसान-मजदूर-दस्तकारों को अपराधी घोषित करके नवाब नजीबुल्लाह के एक त्यक्त दुर्ग में कैद कर लिया गया। उन्हीं में सुलतान अहमद उर्फ सुल्ताना डाकू के माता-पिता भी थे। इसी किले में उसका जन्म हुआ। जब उसने होश संभाला, तो स्वयं को एक ऐसे अपराधी के रूप में पाया, जिसने कोई अपराध कभी किया ही नहीं। किशोर होते ही उसने किले में कैद अपने हमउम्र किशोरों से कहा- हम कैद में जन्मे और कैद में मर जाना है, क्या यह जुर्म हमने पिछले जन्म में किया, जिसकी वजह से हम यहां कैद हैं? सुल्ताना ने अपने साथियों का आह्वान किया। एक दिन, अल सुबह सुल्ताना और उसके साथी किले से भाग उड़ेअपनी पदचापों से धरती का दिल धड़काते हुए और फिर सुल्ताना ऐसा दुर्दात दस्यु बना, जैसा कभी न कोई हुआ और न होगा।
राजीवनयन बहुगुणा की फेसबुक वॉल से

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