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भरोसा खोती आप सरकार

देश भर के नेताओं को ईमानदार और भ्रष्ट होने के प्रमाण-पत्र बांटती आम आदमी पार्टी और उसके नेता इस मुगालते में हैं कि देश की जनता मुग्ध होकर उनकी बात सुन रही है और उन्हें अपने दिल में भी उतार रही है। हकीकत कुछ अलग है। अरविंद केजरीवाल की सादगी की कलई तो उसी वक्त खुल गई, जब उन्होंने मुख्यमंत्री बनते ही दो आलीशान बंगले में विराजने का मन बना लिया था, और उनके मंत्री चमचमाती नई गाड़ियों में सवार हो गए थे। जनहित के नाम पर अराजक होने की हद तक उनकी क्षुद्र राजनीति भी रेल भवन के सामने पूरे देश ने देखा। बिन्नी की बगावत ने पार्टी के भीतर के लोकतंत्र को भी सरेआम कर दिया है। मगर आप के नेताओं की लबर धों-धों जारी है कि हम अब भी सबसे अलहदा हैं। सच्चई तो यह है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री और उनकी सरकार के मंत्री जनता से किए गए वायदों को पूरा करने की बजाय सिर्फ नाटक कर रहे हैं और मीडिया को अपने इर्द-गिर्द समेटे हुए हैं। दिल्ली की जनता का मोहभंग होने लगा है और लोग कहने लगे हैं कि शीला का शासन बहुत बुरा नहीं था। वह तो केंद्र की करतूतों ने उन्हें मार दिया।
अधीर सिंह, पटपड़गंज, दिल्ली- 92

कश्मीर में सेना
‘कश्मीर में सेना’ शीर्षक से प्रकाशित आपका संपादकीय पढ़ा। अच्छा लगा। हमारे सेनाध्यक्ष ने साफ कह दिया है कि अभी जम्मू-कश्मीर से सेना हटाने के हालात नहीं हैं। प्रशांत भूषण जैसे लोग कश्मीर को लेकर अक्सर विवाद पैदा करते हैं। कश्मीर से सेना हटाई जाए या नहीं, इस पर विचार करने का काम सेना पर छोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि नेताओं के फैसले आम तौर पर सियासी होते हैं, जो देश पर भारी भी पड़ सकते हैं। यदि सेना को वहां से हटा लिया गया, तो पाकिस्तानी आतंकियों के पौ-बारह हो जाएंगे। जब तक राज्य में हालात बिल्कुल सामान्य न हो जाएं, तब तक सेना को हटाने के बारे में सोचा भी नहीं जाना चाहिए।
इंद्र सिंह धिगान, रेडियो कॉलोनी, किंग्जवे कैंप, दिल्ली

सबको मिले घर
हमारे देश की आवास नीति, खासकर शहरी आवास नीति अजीबोगरीब है। इसके कारण एक तरफ झुग्गियों की तादाद बढ़ रही है, तो वहीं दूसरी तरफ, हजारों तैयार मकानों में ताले पड़े हैं। खासकर दिल्ली और उसके आसपास के शहरों- नोएडा, गुड़गांव, फरीदाबाद, गाजियाबाद में बड़ी-बड़ी इमारतें उग आई हैं। उनके हजारों फ्लैट खरीदार के बिना या तो खाली पड़े हैं या फिर वे कुछ सुविधाओं से वंचित हैं। क्या सरकार ऐसी कोई नीति नहीं बना सकती, जिससे इनके दाम मध्यवर्ग की पहुंच में आ जाएं और लोग अपने घर का सपना पूरा कर सकें? आखिर जब शहरों में सबसे बड़ी आबादी मध्यवर्ग की है, तो वहां इतने महंगे फ्लैट बनाने की इजाजत ही क्यों दी जाती है, जिनका बिकना मुश्किल हो जाए या फिर जो काला धन को बढ़ावा दें?
मोहम्मद अनवर, इंदिरा विहार, दिल्ली-09

गरीबी रेखा पर राजनीति
हाल ही में गुजरात सरकार द्वारा पेश गरीबी रेखा के आंकड़ों को लेकर देश में फिर से बहस छिड़ गई है। वर्ष 2013 में केंद्र सरकार ने जहां 32 रुपये प्रतिदिन से कम खर्च करने वालों को गरीब माना था, वहीं गुजरात सरकार ने 17 रुपये से कम खर्च करने वालों को गरीब माना है। जाहिर है, दूसरी पार्टियों को बीजेपी और नरेंद्र मोदी पर हमला करने का मौका मिल गया है। यह ठीक है कि सभी राज्यों की अपनी-अपनी शहरी विकास नीतियां हैं और उन्हीं के आधार पर प्रांतीय सरकारें गरीबी रेखा के आंकड़े पेश करती हैं। लेकिन हमारे नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि गरीबों की याद उन्हें चुनावों के समय ही क्यों आती है? जब तक हमारे नेता गरीबी के नए-नए आंकड़े पेश करने की जगह गरीबों की मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान नहीं देंगे और उनके विकास के लिए सफल एवं सार्थक आर्थिक नीतियां नहीं बनाएंगे, तब तक देश का सुदृढ़ विकास नहीं हो सकेगा।
प्रेम कुमार सिंह, विद्याज्ञान, बुलंदशहर 

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