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शाहाबाद की सब्जी मंडी में अव्यवस्था की ‘सड़ांध’

 शाहाबाद। हिन्दुस्तान संवाद। आज से 44 साल पहले बनी कस्बे की सब्जी मंडी अपनी हालत पर खुद जार जार रो रही है। यहां पीने को पानी नहीं तो लघुशंका के चलते आने-जाने की कोई जगह नहीं।

टिन टूट जाने से खुद दुकानदार पन्नी तानकर अपना काम चला रहे हैं। एक लाख से अधिक आबादी वाले इस कस्बे के पूर्व चेयरमैन सज्जाद खां ने इस सब्जी मंडी को 1969 में बनवाकर इसे गांधी मार्केट का नाम दिया था। उस दौर में इस सब्जी मंडी को जिले की बेहतरीन और खूबसूरत मंडी का दर्जा प्राप्त था लेकिन वक्त बदला तो धीरे धीरे इसकी रंगत भी उतरती चली गई और अब मौजूदा हालात यह है कि यहां समस्याओं के अम्बार खड़ा है।

पूरी मंडी में गंदगी का साम्राज्य है और लोग मंडी में कम सड़कों पर लगी दुकानों पर ज्यादा नजर आते हैं। यहां मंडी के अंदर तकरीबन 100 से अधिक दुकानें हैं जिनसे 100 रुपया प्रति माह मामूली किराया वसूला जाता है। इन दुकानों पर लोग अपने हिसाब से अलग अलग व्यापार कर रहे हैं। तीन दर्जन से अधिक सब्जी की आढ़तें हैं और तकरीबन 250 एसे चबूतरे हैं जिन पर छोटे दुकानदार तीन रुपया प्रति दिन के हिसाब से 90 रुपया माहवार की अदायगी कर सब्जी बेचने का काम करते चले आ रहे हैं।

नगरपालिका की इस सम्पत्ति से वसूली तो होती है लेकिन पालिका यहां के दुकानदारों की दिक्कतों से मुंह फेर कर पूरी तरह अनदेखी कर रही है। यहां पड़ा टीन शेड पूरी तरह टूट चुका है। दुकानदार पूरे साल पन्नी डालकर सिर छुपाने की जुगत भिड़ाते हैं। और तो और पूरी मंडी में पानी पीने के लिए एक भी नल नहीं है। बाहर सड़क पर जिन होटलों पर लोगों ने अपने निजी नल लगवा भी रखे हैं वे पानी भरने पर एतराज जताते हैं जिसके चलते लोग दुकानों पर ही अपने पानी का प्रबंध करके रखते हैं।

कहने को मंडी के अंदर एक शौचालय भी हैं लेकिन उसकी हालत इतनी बुरी है कि कोई उसकी तरफ रुख भी नहीं करता। महीनों बीत जाने के बाद भी यहां सफाई कर्मी नहीं आता। नतीजा यह है कि ज़रूरत पर लोग इधर उधर के खंडहरों या फिर अपने घर ही भागते हैं। बिजली न होने से पूरी मंडी अंधेरे में डूबी रहती है। सौर ऊर्जा लाइट के भी पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। यहां की साफसफाई पर भी ध्यान नहीं दिया जाता, जिसके चलते पूरी मंडी गंदगी के ढेर पर खड़ी नजर आती है।

दुकानदारों का कहना है कि इन समस्याओं के चलते अब मंडी तक लोगों का आना कम होता जा रहा है विभिन्न मोहल्लों और चौराहों पर सब्जी की दुकानें आम हो चुकी हैं। रोज़गार से जुड़े् लोग काफी परेशान है। सीधे तौर पर उनके सामने रोजी रोटी का सवाल आ खड़ा हुआ है।

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