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बेरहम सियासत

राजनीति में मुरदे भी बड़े काम के होते हैं। इसलिए ये कभी गाड़े नहीं जाते। उन्हें हमेशा जिंदा रखा जाता है, ताकि मुफीद वक्त पर वे काम आ सकें। हमारे नेताओं ने सियासत के इस सूत्र का बखूबी इस्तेमाल किया है। एक बार फिर सरकार बनाने की बारी आई है। भ्रष्टाचार, महंगाई, गरीबी, घोटाला, विकास सरीखे कई मुद्दे हैं। देश भर की जनता महंगाई से हांफ रही है। भ्रष्टाचार से त्रस्त है। शहर से लेकर गांव तक, एक बड़ा तबका, सामाजिक-आर्थिक-शैक्षिक विकास से कोसों दूर है। लोग सरकार से एक मजबूत नीति की उम्मीद लगाए बैठे हैं। एक ऐसी नीति, जिसमें लोगों को भरपेट खाना मिल सके। लेकिन सियासी गणित के हमारे आर्यभट्टों ने हिसाब लगाकर दंगों में मारे गए मुरदों को जिंदा किया है।

एक बार फिर सड़कों पर हंगामा मचा है। हत्या का हिसाब मांगा जा रहा है। बहुत हो चुका। अब माफी से काम नहीं चलेगा। गुनहगारों के लिए फांसी मांगी जा रही है। सिर्फ सिख दंगा नहीं, मलियाना दंगा, गुजरात दंगा, भागलपुर दंगा, कई दंगे हैं, जिनकी फाइल चुनाव नजदीक आते ही खुल जाती हैं। करोड़ों लोगों के असली मुद्दे गौण हो जाते हैं। न्याय-अन्याय का हिसाब होने लगता हैं। यकीन जानिए। दंगों के असली गुनहगारों का सही-सही हिसाब कभी नहीं होगा। उन मारे गए लोगों के अपनों से सहानुभूति का ढोंग करने वाले किसी भी दल के नेता न्याय नहीं होने देंगे, क्योंकि मुरदे जिंदा रहेंगे, तो वैचारिक शून्यता में भटकने वाले नेताओं के लिए रामबाण की तरह वे काम आते रहेंगे।
कोइलख एक्सप्रेस में अंकुर कुमार झा

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