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शुरू में ही विवाद

अगर केंद्र की संप्रग सरकार और कांग्रेस पार्टी यह साबित करना चाहती है कि भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए उसने लोकपाल बिल पास करवाया है, तो मौजूदा विवाद उसके लिए बहुत अच्छा नहीं है। विवाद फिलहाल लोकपाल की नियुक्ति को लेकर नहीं है, बल्कि लोकपाल चुनने के लिए बनी समिति के पांचवें सदस्य को लेकर है। लोकपाल चुनने के लिए कानून में पांच सदस्यीय समिति का प्रावधान है। इनमें से चार सदस्यों को लेकर विवाद की कोई गुंजाइश नहीं है, इनमें प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में नेता विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश या उनके प्रतिनिधि शामिल हैं। इन चारों को मिलकर पांचवें सदस्य को चुनना है, जो कानून के मुताबिक कोई प्रतिष्ठित कानूनविद् होना चाहिए। सरकार ने पांचवें नाम के लिए पीपी राव का नाम प्रस्तावित किया, जिसका विरोध नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने किया। सुषमा स्वराज का कहना है कि पीपी राव कांग्रेस पार्टी के करीबी हैं और पांचवें सदस्य को निरपेक्ष होना चाहिए। लेकिन बाकी तीनों ने पीपी राव के नाम पर मुहर लगा दी, इसलिए उनका नाम स्वीकृत हो गया, मगर अब सुषमा स्वराज ने अपनी असहमति भी दर्ज करवा दी है। उनका कहना है कि भाजपा इस मुद्दे को राष्ट्रपति के पास ले जाएगी।

अगर पांचवें सदस्य का चुनाव सर्वानुमति से होता, तो यह ज्यादा अच्छा होता। लोकपाल इस देश के लिए एक नई शुरुआत है और सर्वानुमति से एक अच्छी परंपरा स्थापित हो सकती थी। अगर पांचवें सदस्य को सबकी मर्जी से चुना जाता, तो इस बात की भी संभावना बनती कि लोकपाल का चुनाव सर्वानुमति से होगा और उसकी निष्पक्षता पर कोई सवाल नहीं उठाया जाएगा। यह चुनावी दौर है, इसलिए इस मसले पर काफी घमासान हो सकता है और विपक्ष यह आरोप लगा सकता है कि सरकार एक निष्पक्ष लोकपाल नियुक्त करने को लेकर गंभीर नहीं है। सुषमा स्वराज ने जो नाम सुझाए थे, उनमें के पाराशरन, हरीश साल्वे और फली नरीमन शामिल थे। ये सभी प्रतिष्ठित कानूनविद हैं या पीपी राव के नाम पर ही सर्वानुमति बनाने की कोशिश की जा सकती थी। पहले भी सरकार ऐसे ही मामले में फंस चुकी है, जब सतर्कता आयुक्त के पद पर उसने सुषमा स्वराज के विरोध को अनदेखा करके पीजी थॉमस को नियुक्त कर दिया था और बाद में कई झमेलों के बाद उसे थॉमस को हटाना पड़ा था।

अगले संसद सत्र में भी उसे कई मामलों में भाजपा के सहयोग की जरूरत महसूस होगी, इसलिए अगर सत्ता पक्ष और विपक्ष यहां टकराव से बचते, तो अच्छा होता। अच्छा तो यह होता कि औपचारिक बैठक के पहले ही अनौपचारिक रूप से किसी नाम पर सर्वानुमति की कोशिश की जाती या फिर सर्वानुमति होने तक कोई फैसला न किया जाता। गठबंधन की राजनीति के दौर में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तालमेल की ज्यादा जरूरत है, लेकिन पिछले कुछ साल में लगभग हर मुद्दे पर दोनों पक्ष के बीच टकराव ही देखने में आया है। अगले चुनावों के बाद जो भी सरकार बनेगी, उसे विपक्ष के सहयोग की जरूरत पड़ेगी, इसलिए अच्छा हो कि इस कार्यकाल की कड़वाहट को यहीं छोड़कर सभी पार्टियां बेहतर रिश्ते बनाने की कोशिश करें। आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार ने अपना जन-लोकपाल तैयार कर लिया है और पूरी आशंका है कि उसके प्रावधानों को लेकर उसका केंद्र सरकार से टकराव हो। मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में लोकपाल बिल पास हुआ है और ऐसे टकराव उसे श्रेय से वंचित रखेंगे। अगर सभी पक्ष कुछ खुलापन और लचीलापन दिखाएं, तो इसमें सबकी अच्छाई है।

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