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आपका मैनेजर और आप

कार्यस्थल पर युवाओं को अपने मैनेजर्स की नजरों में सकारात्मक छवि बनाने की जरूरत बहुत अधिक होती है। इसके लिए उन्हें अतिरिक्त प्रयास करने की जरूरत होती है। मैनेजर के व्यक्तित्व और पसंद-नापसंद को समझना इस मामले में बहुत जरूरी है। बता रही हैं सोनल अग्रवाल

कुछ दिनों पहले एक युवा सहकर्मी मेरे पास आई और अपने नए बॉस के साथ बिगड़े संबंधों का दुखड़ा सुनाने लगी। उसकी नई-नई नौकरी थी और कोई भी काम वह ठीक से नहीं कर पा रही थी। इतना ही नहीं, बॉस हर दूसरे काम के लिए उसकी बजाय दूसरों को जिम्मेदारी सौंप रहे थे। धीरे-धीरे नौकरी उसे बोझिल लगने लगी। कंपनी उसकी पसंद की थी, फिर भी वह हतोत्साहित लग रही थी और रोज काम पर आना उसे भारी लगने लगा था। उसके सामने सवाल था कि क्या उसे नौकरी छोड़ देनी चाहिए या वह किसी अन्य बॉस के नीचे काम करने की दरख्वास्त दे ? इस मसले में उसके बॉस कोई तानाशाही प्रवृत्ति के व्यक्ति नहीं थे। मैंने उसे सलाह दी कि वह आगे बढ़ कर संबंध सुधारने का प्रयास करे। उसे करियर के दौरान हर कहीं मुश्किल और उम्मीदें खारिज करने वाले बॉस मिलेंगे, इसलिए यदि उसे करियर में आगे बढ़ना है तो शुरू से ही मैनेजर्स की रोजाना की मनोदशा पढ़ने की आदत डाल लेनी चाहिए।

बॉस से सहयोग प्राप्त करना इसी तथ्य पर आधारित होता है कि आपके उनके साथ संबंध कैसे हैं, आप उनकी उम्मीदों पर कैसे खरे उतरते हैं और कैसे उतार-चढ़ाव का सामना करते हैं। याद रखें कि बॉस और अधीनस्थ का संबंध मूलत: सहजीविता का संबंध होता है और उसमें असमानता भी होती है। सबसे पहले लक्ष्यों को समझना जरूरी है, फिर बॉस को और उनके लिए जरूरी प्रोफेशनल गोल्स और उद्देश्यों को। काम से जुड़े आपके आउटपुट का बॉस की सोच पर असर पड़ेगा। तो आखिर आप कैसे सुधार ला सकते हैं इस संबंध में ?

उम्मीदों पर काबू
एक बड़े कार्य में अपनी भूमिका को समझें और बॉस की उम्मीदों को भी। इसमें न केवल अपने काम के प्रति रजामंदी, बल्कि समग्र उद्देश्य की जानकारी भी होनी चाहिए, जिसके अंतर्गत फैसले लेने से जुड़ी आपकी सीमाएं भी स्पष्ट हों, मसलन काम कैसे किया जाए, कैसे उसे पेश किया जाए या उसके रिव्यू से जुड़े मुद्दे भी साफ हों। संप्रेषण में कमी या गलतियों की गुंजाइश कम से कम रखें - इसके लिए मीटिंग और फैसलों से जुड़े बिंदुओं को दोहराते रहें। ध्यान रखें कि आप और आपके बॉस एक ही विषय पर सोचें। इसके बावजूद, यदि कोई गलती होती है तो आपके बचाव की भूमिका मजबूत रहेगी।

भरोसा और विश्वास
आपकी छवि भरोसेमंद व्यक्ति की होनी चाहिए, अधिक का वादा करके कम काम करने वाले की नहीं। यथार्थ की जमीन पर खड़े होकर ही वादे करें, उसके बाद समय-सीमा का ध्यान रखें और कार्यप्रणाली को रिव्यू करते रहें। अपने काम के लिए यदि अतिरिक्त समय भी देना पड़े तो उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए। मतलब यदि शनिवार शाम तक काम पूरा न हुआ हो तो रविवार को दफ्तर आकर काम पूरा करने के लिए तैयार रहें। यदि आपको महसूस हो कि आपकी क्षमता से अधिक काम आपके हिस्से आ गया है तो रुकें, उसके समाधान पर सोचें और समय रहते बॉस की उम्मीदों में बदलाव लाने के प्रयास करें यानी जहां संभव हो, उस हिस्से पर जोर दें।

समय का ध्यान
याद रखें कि अपनी कमियां आपको समय रहते पता चल जाएं। ऐसा न हो कि आपके बॉस को आपकी किसी कमी या गलती के कारण उपहास का पात्र बनना पड़े।

व्यवस्थित रहें
आपके बॉस की कई प्राथमिकताएं हो सकती हैं, उन्हें कई नतीजे प्राप्त करने होते हैं, कई लोगों को मैनेज करना होता है और यह सब करने के लिए उनके पास उतना ही समय होता है, जितना आपके पास। कार्य के रिव्यू आदि के लिए समय विशेष का ध्यान रखें, प्राथमिकताएं तय करें, समय पर पहुंचें और मीटिंग में मुद्दे पर ही बात करें। इसके अलावा, मीटिंग के दौरान हमेशा नोट्स लें, उन्हें सुरक्षित रखें और मीटिंग के दौरान कलम या किसी फाइल आदि को खोजने में दिखने वाली हबड़ा-तबड़ी से बचें। कार्य के जरूरी पक्षों का पूर्वानुमान करना जरूरी होता है। उससे जुड़ा डेटा भी तैयार रखें।

समस्याएं नहीं, समाधान दें
बेशक शिकायत कहने और सुनने का समय होता है, लेकिन बॉस यह नहीं चाहेंगे कि कार्यस्थल शिकायत दफ्तर बन जाए। यदि समस्या की जड़ आप हैं तो उसे सुलझाने में भी सहयोग दें। अन्य मुद्दों पर गौर से सोचें और विकल्प सामने रखें, साथ ही चुनौतियां भी। एक से अधिक विकल्प सुझाने पर यह पता चलेगा कि आपने समस्या पर गहराई से सोचा है और आप कुछ जिम्मेदारी निभा रहे हैं। चाहे आप हमेशा ठीक न हों, परंतु फिर भी बॉस को लगेगा कि आप अतिरिक्त प्रयास के जरिए खुद उसका काम आसान कर रहे हैं।

बदलें और अपनाएं
उतार-चढ़ाव के दौरान उम्मीदों पर खरा उतरना बताता है कि आपके संबंध बॉस के साथ किस तरह का रूप ले रहे हैं। इसमें आपको पता करना होता है कि बॉस कार्य के समय में ही काम पूरा करना पसंद करते हैं, संक्षिप्त जानकारी चाहते हैं या विस्तार पसंद करते हैं, ईमेल से सूचना चाहते हैं या रूबरू, वह प्रेजेंटेशन किस तरह और कब पसंद करते हैं आदि। वह किए जा रहे काम की बड़ी तस्वीर चाहते हैं या आंकड़े ? उनकी रफ्तार, बॉडी क्लॉक, पूर्वाग्रहों और आदतों पर गौर करें। इनकी पहचान के बाद काम काफी आसान हो जाएगा। हालांकि, एक ऊंचे स्तर पर आपको यह भी तलाशना होता है कि वह कलात्मक अभिरुचि के हैं या गणितीय? अव्यवस्थित हैं या व्यवस्थित? रक्षात्मक प्रवृत्ति के हैं या उग्र? मितव्ययी हैं या उन्मुक्त? काम बांट कर करते हैं या सब कुछ अपने काबू में रख कर? आप किस तरह उनकी तारीफ करते हैं या विरोध करते हैं, वही कारगर तरीका आप दोनों के बीच सामंजस्य बैठाएगा।

लचीलापन
एक ओर आप अपनी सीमा न लांघने को लेकर सचेत रहते हैं, लेकिन साथ ही यह भी दर्शाएं कि आप अपनी जिम्मेदारी से बढ़ कर और क्या कर सकते हैं। वह हुनर जिन्हें आप और तराशना चाहते हैं, उनका प्रदर्शन करें और यह भी दर्शाएं कि आप बॉस से सीखने की इच्छा रखते हैं। जो लोग अधिक जिम्मेदारी चाहते हैं, उन्हें वह मिल भी जाती है। साथ ही फीडबैक और अल्पकालिक रिव्यू भी प्राप्त करें, चाहे बॉस उनके लिए तैयार हो या नहीं।

संबंध बनाएं
इसका मतलब यह नहीं कि आप अपनी निजी परेशानियां बॉस के सामने लेकर बैठ जाएं। इसका मतलब है कि आप उनसे ऐसा व्यवहार करें, जैसा आप चाहते हैं कि वह आपके साथ करें। बॉस भी भावनाओं वाला एक इनसान है, उसकी अपनी भी समस्याएं हो सकती हैं। आप उन्हें पसंद न भी करते हों, तो भी उन्हें आदर दें। अच्छे बॉस बहुत जल्द व्यक्ति को पहचान जाते हैं। सबके बीच में बॉस की छवि के प्रति सचेत रहें, परंतु अकेले में सही शब्दों में अपनी सलाह दें।

पॉजिटिव स्ट्रोक्स
गलतियों का कारण समय के साथ सामने आ जाता है, जिसके बाद जिम्मेदारियां बदली जाती हैं, जिनका लाभ काम सीखने में उठाना चाहिए। परंतु किसी भी अन्य संबंध की तरह, यह संबंध एकतरफा नहीं होना चाहिए। बॉस को अपनी ओर से फीडबैक दें, उन्हें बताएं कि जो आपने सीखा, उसे सीख कर कितना आनंद आया। कई बार आपके तमाम प्रयासों के बाद भी काम नहीं बन पाता। भरोसा टूट जाता है, बॉस से कैमिस्ट्री नहीं बन पाती। फिर भी अलविदा कहने से पहले अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करते हैं। यदि नए बॉस के समय भी ऐसा ही होता है तो आपको अपना गंभीर आकलन करने की जरूरत होगी।

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