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मीडिया से असहज संबंध बने पार्टी के लिए चुनौती

मीडिया से असहज संबंध बने पार्टी के लिए चुनौती

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के हालिया टीवी साक्षात्कार और उसके बाद आई प्रतिक्रिया ने एक बार फिर कांग्रेस के मीडिया से असहज संबंधों को रेखांकित किया है। विगत वर्षों में सरकार और पार्टी मीडिया से नजदीकियां बढ़ने और उसकी उपयोगिता को खारिज करने की नीति के बीच झूलती रही। अब अगर मीडिया से नजदीकी बढ़ने के प्रयास भी किए जाएं तो कांग्रेस को पता है कि यह रक्षात्मक ही होगा।

कहां हुई गलती: एक केंद्रीय मंत्री ने पहचान गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि मीडिया से खराब रिश्ते सरकार के लिए मुश्किल खड़ी कर रही है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2011 -12 एक नया मोड़ आया। इस दौरान घोटाले की खबरें मीडिया में छाई रही। उस दौरान हमने गलती की और मीडिया पार्टी की लगातार नकारात्मक और निराशावादी छवि बनाता रहा।

पार्टी के एक अन्य सूत्र ने आरोप लगाया कि इंडिया इंक नरेंद्र मोदी का समर्थन कर रही है। इसका प्रभाव मीडिया के कवरेज पर भी पड़ा है। उन्होंने कहा कि कॉरपोरेट कब्जे वाले मीडिया घरानों का मोदी का समर्थन सबके सामने है। शहरी मध्यम वर्ग के पत्रकार भी मोदी और आप का समर्थन कर रहे हैं क्योंकि वे सरकार के कामकाज से नाखुश हैं।

बदली रणनीति:
नई रणनीति के तहत यूपीए सरकार पिछले साल मई महीने में भारत निर्माण का विज्ञापन लेकर आई। इसका मकसद नकारात्मक छवि को दूर करने के साथ वित्तीय संकट से गुजर रहे मीडिया घरानों को फंड उपलब्ध कराना था। पार्टी ने भाजपा की तरह न्यू मीडिया प्रकोष्ठ गठित किया। नए प्रवक्ताओं की नियुक्ति की गई और उन्हें ट्रेनिंग दी गई। 8 दिसंबर को पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने भी पार्टी को मीडिया से नजदीकी बढ़ने के लिए मजबूर किया। राहुल का साक्षात्कार इसी की कड़ी है।

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