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शिक्षा माफियाओं पर नकेल कसने पर गई शिक्षाधिकारी की जान

यूपी बोर्ड परीक्षा से ठीक पहले शिक्षा माफियाओं पर नकेल कसने की कोशिश में एक और शिक्षाधिकारी को जान गंवानी पड़ी। ऐसी कोशिश करने वाले कुछ अधिकारियों पर पहले भी हमले हो चुके हैं। और तो और, तत्कालीन बसपा-भाजपा की संयुक्त सरकार में माध्यमिक शिक्षा मंत्री ओमप्रकाश सिंह का विभाग बदल दिया गया था क्योंकि उन्होंने माध्यमिक शिक्षा में माफियाओं की घुसपैठ पर रोक लगाने की मुहिम शुरू की थी।

शिक्षाधिकारियों को धमकाने और उन पर बेजा दबाव बनाने की घटनाएं आम हैं। इस बार गाजीपुर के एबीएसए कृष्णमुरारी यादव की हत्या घटनाओं की ताजी कड़ी है। ऐसी घटनाओं की श्रृंखला रुकेगी, यह कहने की स्थिति में कोई नहीं है।

वाराणसी के तत्कालीन संयुक्त शिक्षा निदेशक डॉं. श्रीकृष्ण पाठक पर सन-2004 में उनके क्वींस कॉलेज स्थित आवास पर कुछ लोगों ने हमला कर दिया था। इस मामले में काफी तूल पकड़ा। कई दिनों तक विद्यालयों में हड़ताल रही। शिक्षा विभाग के कार्यालयों में कामकाज ठप रहा। इसके बाद सन-2008 में जौनपुर में जिला विद्यालय निरीक्षक दिनेश पांडेय की गोली मारकर हत्या कर दी गई। डीआईओएस की हत्या से पूरे प्रदेश में खलबली मची थी। दिनेश पाण्डेय सख्त मिजाज के अधिकारी जाने जाते थे।

सोमवार को गोलियों के शिकार हुए गाजीपुर के एबीएसए कृष्ण मुरारी यादव से खता सिर्फ यही हुई कि उन्होंने निजी स्कूलों की छानबीन शुरू कर दी। गाजीपुर नकल के मामले में पूरे प्रदेश में बदनाम रहा है। बोर्ड परीक्षाओं के दौरान शिक्षा माफियाओं की यहां एक से एक हरकतें सामने आती रहीं हैं। उन्हें राजनीतिक संरक्षण भी मिलता है। अभी से नहीं, वर्षों पहले से। बोर्ड परीक्षा इन माफियाओं की आमदनी का बहुत बड़ा स्त्रोत है। केन्द्र निर्धारण से लेकर परीक्षा दिलाने तक बाकायदा ठेका होता है। शिक्षा विभाग के स्थानीय अफसर इस व्यापार के खिलाफ मुंह नहीं खोल पाते। वहां डीआईओएस या बीएसए का चार्ज लेने में भी शिक्षाधिकारी हिचकते हैं। शिकायतें बढ़ने पर पिछले वर्ष माध्यमिक शिक्षा परिषद ने गाजीपुर में फर्जी परीक्षार्थियों की गंभीरता पूर्वक छानबीन कराई। परिणाम यह हुआ कि संख्या के हिसाब से प्रदेश में अव्वल रहने वाले गाजीपुर में बोर्ड परीक्षार्थियों की संख्या में 50 हजार तक कमी आ गई थी।

बोर्ड परीक्षा केन्द्रों का निर्धारण नए सिरे से शुरू हुआ है। बोर्ड परीक्षा में फर्जी स्कूलों का खेल जगजाहिर है। इनके पास मान्यता जूनियर हाईस्कूल की होती है मगर दाखिला 12वीं तक का लेते हैं। स्कूलों पर बोर्ड भी इंटरमीडिएट के लगे रहते हैं। इन्हीं फर्जी स्कूलों के छात्र दूसरे स्कूलों से बोर्ड परीक्षार्थी बनते हैं। गाजीपुर में पूरे प्रदेश से नहीं, हरियाणा, पंजाब, बिहार प्रांतों के अलावा नेपाल से भी छात्र 10वीं और 12वीं की परीक्षा देने आते रहे हैं। जाहिर तौर पर पिछले वर्ष की कड़ाई से बौखलाए शिक्षा माफिया एबीएसए कृष्ण मुरारी की नई मुहिम से भी असहज हुए होंगे। पारिवारिक विवाद बनाम शिक्षा माफिया में हकीकत क्या है, यह अब पुलिस तफ्तीश में सामने आएगा मगर इस हत्याकांड को लेकर उठीं चर्चाएं एकबारगी नकारी भी नहीं जा सकतीं।

अधिकारियों और कर्मचारियों में रोष
वाराणसी। गाजीपुर के एबीएसए कृष्ण मुरारी यादव के हत्या की खबर मिलते ही शिक्षा विभाग के कर्मचारी और अधिकारी स्तब्ध रह गए। एडी (बेसिक) विजयशंकर मिश्र तुरंत दीनदयाल उपाध्याय हॉस्पिटल पहुंचे गए। उन्होंने गाजीपुर के शिक्षाधिकारियों से बात की।

प्राविंसियल एजुकेशनल सर्विस एसोसिएशन के प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य व वाराणसी के जिला विद्यालय निरीक्षक चन्द्रजीत सिंह यादव ने इस घटना की निंदा की है। उन्होंने कहा कि एबीएसए की हत्या किन परिस्थितियों में हुई, इसकी पूरी जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा है कि पीईएस एसोसिएशन इस मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग करता है। यूपी एजुकेशनल मिनिस्ट्रीयल आफिसर्स एसोसिएशन के मंडलीय मंत्री, जिलाध्यक्ष दीपेन्द्र श्रीवास्तव, सचिव सुभाष सिंह ने भी घटना की निंदा करते हुए उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि शिक्षाकर्मियों व अधिकारियों पर इस तरह का हमला असाधारण बात है।

‘घटना दुर्भाग्यपूर्ण और अफसोसजनक है। कैसे और किन परिस्थितियों में एबीएसए की हत्या हुई, इसकी निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए ताकि सच सामने आ सके। इस मामले में दोषियों को बख्शा नहीं जाना चाहिए।’
-चेतनारायण सिंह, शिक्षक विधायक

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