DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

नए दौर की दुनियादारी

फेसबुक पर सक्रिय किसी उत्साही शख्स के दोस्तों की सूची खंगालिए। इसमें उसके परिवार के सदस्य, रिश्तेदार, दफ्तर या कामकाज के सहयोगी और कुछ अड़ोसी-पड़ोसी तो होंगे ही, साथ ही वे लोग भी होंगे, जिनके साथ उसने स्कूल में पढ़ाई की थी, जिनके साथ वह कॉलेज गया था, जिनके साथ गली-मुहल्ले में तरह-तरह के खेल खेले थे, गप्पें लड़ाई थीं, या आवारागर्दी की थी, जिनके साथ वह कई मसलों पर इत्तेफाक रखता है और वे लोग भी, जिनके साथ आगे चलकर कार्य-व्यापार वगैरह में कुछ संभावनाएं बनती हों। एक बार इस सूची को फिर से देखें। इसमें दुनिया भर में रह रहे वे लोग हैं, जो दरअसल उसका अतीत हैं। वे लोग हैं, जो उसके वर्तमान से जुड़े हैं। और वे भी लोग हैं, जिनसे वह भविष्य की कोई उम्मीद बांधता है। यही फेसबुक की ताकत है कि उसमें आप अपने अतीत से लेकर भविष्य तक के तमाम लम्हों को एक साथ जी सकते हैं। बिल्कुल अभी, किसी भी क्षण। अब जरा दस साल पहले की दुनिया को याद करें। दस साल पहले के शहरों, खासकर महानगरों की दुनिया को। तब तक, दुनिया भर में फैल रहे व्यक्तिवाद पर काफी कुछ लिखा जा चुका था। शहर की भीड़ में व्यक्ति किस तरह अकेला हो गया है, इस पर बहुत सारे शोध हुए, बहुत सारी कविताएं बनाई गईं, ढेर सारी कहानियां और उपन्यास भी लिखे गए, फिल्में भी बनीं। यह कहा जाने लगा था कि शहर के लोग समाज या सामाजिकता में नहीं, एक माहौल, एक इको-सिस्टम में जीने लगे हैं।

जीवन की भागदौड़ में सामाजिकता के लिए वक्त भी किसके पास था? जो पुराने गहरे दोस्त थे, उनसे बस जान-पहचान भर ही बाकी बची थी। कभी वक्त-जरूरत टेलीफोन पर कुछ बात भी हुई, तो न मिल पाने की मजबूरी और इसका पछतावा, दोनों की बातों में झलकता था। नाते-रिश्तेदारों से तो बस मुलाकात खुशी और गमी के कुछ अवसरों पर ही होती थी। शहरों में आकार ले रही यह जीवन शैली आल्विन टॉफल्र के लिए सबसे बड़ा फ्यूचर शॉक थी। टॉफ्लर ने इसकी भविष्वाणी साढ़े चार दशक पहले कर दी थी। ऐसा नहीं है कि लोगों को इस नई जीवन शैली में मजा आने लग गया था, पूरा जीवन ऐसा बन गया था कि किसी बड़े सामाजिक ताने-बाने को बनाए रखने या उसमें जीने की गुंजाइश ही नहीं थी। फेसबुक की भूमिका यही है कि एक अलग तरीके से उसने फिर से हमें इसकी गुंजाइश दी। हमें एक ऐसी व्यवस्था दी कि हम अपनी दिनचर्या के दायरे से बाहर रह रहे अपनों से जुड़ सकें, बातें कर सकें, तस्वीरें साझा कर सकें। फेसबुक ने उन बहुत से संबंधों में फिर से जान डाल दी, जो या तो एक याद बनकर रह गए थे, या भूली दास्तां। अब आपको फेसबुक पर पता चलता है कि आपके दोस्त रवीश कुमार सिर्फ टीवी एंकर ही नहीं हैं, वे अभी भी गाहे-बगाहे फुलझड़िया छोड़ते हैं, बेतुकी तुकबंदी करते हैं।

नीरज बधवार का व्यंग्य सिर्फ अखबारों तक ही सीमित नहीं है, वह दिन भर लाइव रहते हैं। काशी विश्वविद्यालय के अध्यक्ष रहे चंचल अभी भी संघ परिवार के पीछे पड़े रहते हैं, लेखन और कला, दोनों में उनके शिल्प का तेवर बरकरार है। अंबरीष कुमार रिटायर होने के बाद भी देशाटन कर रहे हैं, और उसकी तस्वीरें फेसबुक पर चस्पां करके लोगों का दिल जलाते रहते हैं। स्कूल में आपके सबसे जिगरी दोस्त ने अब फ्रेंच कट दाढ़ी रख ली है। कॉलेज में साथ पढ़ने वाला वह कवि अब अपनी कविताओं से पहले की तरह बोर नहीं करता। लेकिन मास्टर जी व्याकरण की गलतियां निकालने से अब भी बाज नहीं आते। आगरा वाले चाचा जी के खिचड़ी बालों की जगह अब चमकती चांद नजर आती है। मुन्नी बुढ़िया लगने लगी है और अब तो उसकी बेटी भी ग्रेजुएशन कर रही है। ममेरा भाई सबको बताता है कि कैसे एक दिन आपकी नेकर उतरवाकर सिर्फ अंडरवियर में घर भागने पर मजबूर कर दिया था। पहले जब किसी शादी-ब्याह के मौके पर पूरा कुनबा जुटता था, तो इस तरह की मीठी यादें सबका दिल बहलाती थीं।

आपके बच्चे भी जान लेते थे कि हमेशा पढ़ने-लिखने का आदेश देने वाले उनके मम्मी-डैडी जब खुद बच्चे थे, तो क्या करते थे। बाद की जिंदगी ने ऐसे मौके छीन लिए थे, फेसबुक ने हमारे उन लम्हों को फिर से लौटा दिया है। फेसबुक की लोकप्रियता का राज यही है कि उसने हमारी जिंदगी की उन जगहों को भरा है, जो रोजी-रोटी के जुगाड़ में खाली छूट गई थीं। और सबसे बड़ी बात है कि यह काम उसने बहुत तेजी से किया है। पिछले दस साल में हमारी सारी दुनिया ही बदल गई है। लगता है, जैसे यह हमेशा से ही ऐसी हो। अब आप जिस समय फेसबुक में सक्रिय होते हैं, जरा याद कीजिए कि दस साल पहले आप उस वक्त का इस्तेमाल किस तरह से करते थे?

हालांकि बात सिर्फ उतने ही वक्त की है। इसके बाहर आपकी जिंदगी बहुत नहीं बदली है। पड़ोसियों से पहचान एक हद से ज्यादा नहीं है। जिनके साथ आप रोज दफ्तर आते-जाते हैं, उनके बारे में आप सिर्फ इतना ही जानते हैं कि वे आपके हमसफर हैं। इससे ज्यादा जानने की फुरसत भी कहां हैं, क्योंकि बस में बैठकर आपको पांच एसएमएस करने हैं, ई-मेल चेक करनी है और फिर फोन करके बताना भी है कि आज आप दस मिनट लेट हो जाओगे। और आपके पास की सीट पर जो बैठा है, वह अपने स्मार्टफोन पर पुणे में बैठे अपने दोस्त से चैट में व्यस्त है, आप से बिल्कुल अनजान। वह ब्लैकबेरी मैसेंजर पर उससे पूछ रहा है कि तीन दिन से उसका दायां कंधा दर्द कर रहा है, क्या करे..? उसे आपके बारे में क्या पता कि हर रोज मिलने वाला यह हमसफर फिजियोथिरेपिस्ट है। नए दौर के जीवन में हम अक्सर अपने आस-पास से अनजान, समस्याओं के समाधान कहीं दूर-दराज में खोजते हैं। फेसबुक के बाहर की जिंदगी में ऐसे ही लोगों की भीड़ है, और हर कोई अकेला है। भले ही उसकी फेसबुक प्रोफाइल बताती हो कि उसके 421 दोस्त हैं। इसे एक दूसरी तरह से भी देखें कि फेसबुक है और फेसबुक नहीं है। फेसबुक हमारे लिए अपनों से जुड़ने, उनसे संवाद करने का एक जरिया है। इस प्रक्रिया में एक मानसिक संतोष है कि जो हमसे दूर हैं, वे बहुत दूर भी नहीं हैं। फेसबुक का न होना इस संतोष से वंचित होना है। जीवन की बाकी सारी समस्याएं दोनों ही हालात में एक जैसी हैं। फेसबुक आभासी दुनिया का सोशल नेटवर्क है। यह असल जिंदगी के सोशल नेटवर्क का विकल्प नहीं है, उस सोशल नेटवर्क का, जिसमें पड़ोसी, दोस्त, रिश्तेदार जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे के काम आते थे। कुछ भी हो, फिलहाल यही जिंदगी है। आप क्या सोचते हैं? व्हाट्स ऑन योर माइंड?

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:नए दौर की दुनियादारी