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मन की ऊर्जा

हमारा जीवन हमारी अपनी सोच और प्रवृत्तियों पर टिका हुआ है। हमारी सोच जितनी संकीर्ण होगी, उतना ही हम स्थूलता से जुड़ेंगे और उसकी सूक्ष्मता से अनभिज्ञ रहेंगे। और हमारी सोच का जितना विस्तार होगा, उतना ही हम हर पक्ष की सूक्ष्मता से परिचित हो सकेंगे। सामान्य तौर पर हम जिस वायु को लगातार ग्रहण करते हैं, उसकी सूक्ष्मता से भी अनभिज्ञ रहते हैं। वायु का सूक्ष्मत्व उसका प्राण है। वायु का सूक्ष्म होना ही हमारे प्राणों की रक्षा करता है। और इस प्राण को हम अपनी इच्छाशक्ति के जरिये कभी वायुमंडल से खींचकर ग्रहण कर सकते हैं। हमारे मन में वह ताकत है कि जिस किसी भी वस्तु, व्यक्ति या भाव की वह कल्पना करता है, उसकी ऊर्जा शक्ति से हम जुड़ जाते हैं। इसी तरह, कुदरत की हर चीज में इश्वरत्व को खोजना एक तरह से हर चीज में उसकी सूक्ष्मता, उसके मूल-भाव को तलाशना ही है। इसीलिए भक्त लोग इसका दर्शन हर व्यक्ति, यहां तक कि हर जीव-जंतु के अंदर करते हैं। इसी भावना से हमारे मन का विकास होता है।

यदि हम बीज के स्थूल आवरण तक सीमित रहेंगे, तो उसे छोटा-सा समझते रहेंगे, लेकिन यदि उसके अंदर निहित संभावनाओं पर ध्यान देंगे, तो हमें पता चलेगा कि उस बीज के अंदर किसी बड़े वृक्ष की संभावना है। अक्सर हम जीवन के स्थूल पक्ष को ही ज्यादा देखते हैं और उसके अंदर निहित संभावनाओं को देख-समझ नहीं पाते। इसलिए सबसे जरूरी यह है कि हम अपनी सूक्ष्म-दृष्टि का विकास करें, अपने जीवन में निहित अकल्पनीय संभावनाओं को स्वीकारें। उन्हें देखने, जानने व स्वीकारने का प्रयास करें। जीवन की सार्थक सफलता इसी में है। इसी कारण गीता  में कृष्ण बार-बार कहते हैं कि तू मुझमें मन लगा, अपनी बुद्धि को मुझमें लगा, मेरा ही चिंतन कर, तो तू मुझे ही प्राप्त होगा और मैं तुम्हे सांसारिक बंधनों से मुक्त कर दूंगा।

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