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विज्ञान और भारत

भारतीय विज्ञान कांग्रेस के उद्घाटन के मौके पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मौजूदा वक्त में विज्ञान और टेक्नोलॉजी की पढ़ाई और शोध का जो महत्व बताया है, उससे कोई इनकार नहीं कर सकता। हर युग में वह देश और सभ्यता दूसरों से आगे रही है, जिसने ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में दूसरों से ज्यादा तरक्की की है, लेकिन मौजूदा वक्त में यह बात ज्यादा सही है। यह कहा भी जा रहा है कि यह ज्ञान की शताब्दी है और आने वाले वक्त में शायद देशों की तरक्की का एकमात्र मानदंड विज्ञान और टेक्नोलॉजी में उनका कौशल होगा। भारत की बड़ी युवा आबादी भी तभी देश की तरक्की में भागीदार हो सकती है, जब उसके पास जरूरी कौशल और ज्ञान हो। जानकारों का कहना है कि भारत भविष्य में वैज्ञानिक शोध का एक बड़ा केंद्र बन सकता है, बशर्ते उसके पास विज्ञान में प्रशिक्षण पाए युवाओं की बड़ी तादाद हो। प्रधानमंत्री का यह कहना है कि भारत को अपने सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का दो प्रतिशत विज्ञान और टेक्नोलॉजी पर खर्च करना चाहिए। लेकिन इस स्तर पर पहुंचने में हमें वक्त लगेगा।

हालांकि सिर्फ पैसा खर्च करना वैज्ञानिक तरक्की का आधार नहीं बन सकता, ज्यादा बड़ी चुनौती विज्ञान से जुड़े संस्थानों में ऐसी संस्कृति विकसित करना है, जहां नौजवान नए रास्ते खोजने के लिए प्रोत्साहित महसूस करें। इसके बिना पैसे का खर्च समस्याओं को बढ़ाएगा ही। कार्य संस्कृति को बदले बिना  पैसा बहाने का नतीजा हम अपनी विश्वविद्यालय शिक्षा में देख रहे हैं। शिक्षकों की तनख्वाह बढ़ाने का एक नतीजा यह हुआ है कि अकादमिक जकड़बंदी कड़ी हो गई और खुलापन घट गया, जो मौजूदा वक्त में नई खोजों की अनिवार्य शर्त है। दुनिया में ज्यादातर शोध इस वक्त एक से ज्यादा विषयों के आपसी तालमेल से संभव हो पा रहे हैं या ऐसे लोग कर रहे हैं, जो एकाधिक विषयों का ज्ञान रखते हैं। मसलन, आज जीव विज्ञान या चिकित्सा में नया शोध भौतिकी की जरूरी मदद के बिना तकरीबन नामुमकिन है या सूचना प्रौद्योगिकी के औजारों का ज्ञान हर क्षेत्र में जरूरी है, जबकि भारत में अलग-अलग विषयों की हदबंदी ज्यादा संकरी होती जा रही है।

शोध की औपचारिकता पूरी करने के लिए तरह-तरह के फर्जी संस्थान और जर्नल शुरू हो गए हैं। नकल और चोरी में हमारे शोधकर्ताओं का नाम इसीलिए बार-बार आता है। इसी के साथ संस्थानों में नौकरशाही की संस्कृति खत्म करनी पड़ेगी, जिसकी वजह से नए वैज्ञानिक स्थापित मूल्यों या धारणाओं को चुनौती देने का साहस नहीं कर पाते। एक बड़ी समस्या यह भी है कि विदेशों में ज्यादातर महत्वपूर्ण शोध जहां उनके विश्वविद्यालयों में होते हैं, वहीं भारत में जो भी काम हो रहा है, वह स्वायत्त संस्थानों में हो रहा है, जिनका शिक्षा से कोई ताल्लुक नहीं है। जब तक यह रिश्ता नहीं जुड़ेगा, तब तक नौजवानों को शोध की संस्कृति से जोड़ना बहुत मुश्किल होगा। कई भारतीय शोध संस्थानों ने बेहतरीन काम किया है, लेकिन कई संस्थान पुराने र्ढे पर घिसट रहे हैं। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र को भी पहल करनी चाहिए। जब तक औद्योगिक संस्थान शोध से नहीं जुड़ेंगे, तब तक शोध की गति धीमी ही रहेगी और उसका इस्तेमाल भी नहीं हो पाएगा। इस दिशा में कोशिशें हुई हैं, लेकिन जरूरत इन कोशिशों को कई सौ गुना बढ़ाने की है। सही माहौल और लोग मिल सकें, तो दुनिया के कई संस्थान खुशी-खुशी भारत में आना चाहेंगे। अगर भारत दुनिया में वैज्ञानिक शोधों का एक बड़ा केंद्र बन गया, तो फिर उसको महाशक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकता, क्योंकि इस दौर में ज्ञान ही शक्ति है।

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