DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

श्रीलंका में जश्ने-आजादी

यदि उचित और पर्याप्त शब्दों में कहूं, तो एक स्वतंत्र और संप्रभु देश के रूप में श्रीलंका अपनी स्वाधीनता की 65वीं वर्षगांठ मना रहा है। हालांकि, यह उत्सव उदासी के परदों के पीछे और अनिश्चितता के घने बादलों के बीच मनाया जा रहा है, क्योंकि युद्ध अपराध न्यायाधिकरण की मांग दुनिया भर में तेज हुई है। कोलंबो को आर्थिक पाबंदियों की धमकियां मिल रही हैं। विदेशी खातों को बंद करने और श्रीलंकाई नेताओं की विदेश यात्रा पर प्रतिबंध लगाने की भी धमकियां मिली हैं। सरकार जब कहती है कि यह एक ‘अंतरराष्ट्रीय साजिश’ है, तो वह आंशिक रूप से सही है, क्योंकि यह किसी न किसी रूप से घरेलू मामलों में बाहरी दखल है। अब लौटते हैं सन 1948 में। लगभग साढ़े छह दशक पहले आजाद सिलोन के प्रथम प्रधानमंत्री डी एस सेनानायके ने ‘राष्ट्र के नाम संबोधन’ में कहा था, ‘स्वतंत्रता अपने साथ गंभीर दायित्व भी लाती है। हमारे कार्य और हमारी चूक, दोनों अब हमारे होंगे। अब हम अपने प्रशासन या किसी संस्था की गलतियों और खामियों के लिए किसी और को दोषी नहीं ठहरा सकेंगे।

इसलिए यह लंका के हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह इस अवसर का लाभ उठाए और देश की सुख-समृद्धि को बढ़ाने के लिए स्वेच्छा से परिश्रम करे। हमारे राष्ट्र में कई नस्लें हैं। हर की अपनी अलग संस्कृति और अपना इतिहास है। यह हमारा काम है कि हम सबमें जो श्रेष्ठ गुण हैं, उन्हें आपस में साझा करें और उच्च गुणवत्ता के निर्माण की इच्छाशक्ति हासिल करें तथा दुनिया भर के लोगों की शांति, सुरक्षा और न्याय के लिए दूसरे देशों के साथ खड़े हों।’ 400 साल के दमनात्मक विदेशी आधिपत्य से मुक्ति के बाद एक देश से लोगों के लिए यही निष्पक्ष और सही अपेक्षा की जा सकती थी। लेकिन आज हमें क्या-क्या हासिल हुआ है? साफ है, सामाजिक-राजनीतिक और यहां तक कि आर्थिक मोर्चे पर तरक्की मिली है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि श्रीलंकाई आज आजाद हैं। स्वतंत्रता को हल्के में नहीं लिया जा सकता। वैसे, राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़े हैं और कई संस्थाओं की गरिमा गिरी है। कई और सुधार होने चाहिए थे, जो नहीं हुए। 
द संडे टाइम्स, श्रीलंका

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:श्रीलंका में जश्ने-आजादी