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असमानता की जड़ें

दूसरे देशों की तुलना में आज अगर भारत में असमानता की जड़ें अधिक गहरी हैं, तो इसकी एक बड़ी वजह जाति-व्यवस्था है। दरअसल, आजादी के बाद इस समस्या से निपटने के लिए जो नीतियां बनाई गईं, वे सही नहीं थीं। 1950 के दशक में आरक्षण का अस्थायी प्रावधान लाया गया। इसके दो दशक बाद संपदा के पुनर्वितरण के लिए एक दंडात्मक और बेअसर कर-व्यवस्था लागू की गई। हाल ही में असमानता से निपटने के लिए मनरेगा और खाद्य सुरक्षा जैसे अधिकार आधारित कानूनों का सहारा लिया गया। लेकिन विषमता के मूल कारण पर ध्यान नहीं दिया गया। दोष दो स्तर वाली हमारी शिक्षा प्रणाली का भी है, जिसकी बदौलत अमीर विद्यार्थी ग्लोबल हो रहे हैं और गरीब के प्रमाणपत्र बेमतलब। निरंतर बढ़ती जनसंख्या, असंतुलित संपदा-वितरण और सकल घरेलू उत्पाद के दस प्रतिशत से भी ज्यादा हिस्सा निजी व्यक्तियों के हाथों में चला जाना असमानता की मूल वजहें हैं।
सुभाष बुड़ावन वाला, शांतिनाथ कॉर्नर, खाचरौद

दिखावा और पहनावा

बीते दिनों प्रकाशित नश्तर ‘बस कर पगले और कितना हंसाएगा’ में सफाचढ़ दाढ़ी और सफाचट दिमाग वाली पर बात पर अब भी हंसी रुकने का नाम नहीं ले रही है। बहुत खूब लिखा है व्यंग्यकार ने। उनका यह व्यंग्य आज के नेताओं पर बिल्कुल फिट बैठता है। वास्तव में बुजुर्ग, गंभीर और अनुभवी लगने के लिए दाढ़ी और जवान लगने के लिए क्लीन शेव को जरूरी समझा जाता है। लिबास से भी अंतर दिखाने की कोशिश होती है। आज नेता मन, वचन और कर्म से अधिक दिखावे और पहनावे पर यकीन करते हैं। वे जोश दिखाते हैं, गरीबों के घर खाते हैं, लोक-लुभावन नारे देते हैं और लंबे-चौड़े घोषणा-पत्र पढ़ते हैं और पुराने नेताओं को उद्धृत कर खुद को महान दिखाने का प्रयत्न करते हैं। इससे ज्यादा कुछ भी नहीं होता।
वेद मामूरपुर, नरेला, दिल्ली

पूर्वोत्तर से पक्षपात

दिल्ली में अरुणाचल प्रदेश के एक युवक की हत्या सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है, बल्कि यह बताता है कि एक समाज के तौर पर हम कितने असहाय और विफल हो चुके हैं। पूर्वोत्तर के साथ हमारा भेदभाव बरसों पुराना है। यह भेदभाव राजनीतिक स्तर पर भी है और सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर भी। चूंकि दिल्ली देश की राजधानी है, इसलिए यह मामला प्रकाश में आया और चूंकि इस मामले में युवक की मौत हो गई, इसलिए कानून-व्यवस्था से लेकर स्थानीय प्रशासन तक की नींद खुली, वरना पूर्वोत्तर के युवकों के साथ भेदभाव महानगरों में आम बात है। बेंगलुरु में फैलाई गई अफवाह याद कीजिए या अगर आप दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं, तो सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम से आए छात्र व छात्रओं के साथ अपने बर्ताव को याद कीजिए। समझ में नहीं आता कि उनकी संस्कृति से परहेज क्यों है?
दीपक कुमार,  खानपुर, दिल्ली

विफल प्रदेश सरकार

उत्तर प्रदेश की सत्ता में समाजवादी पार्टी करीब पौने दो साल पहले आई। इतने दिन काफी होते हैं चुनावी वायदों को पूरे करने के लिए। लेकिन क्या सपा सरकार अपने वायदों को पूरा कर पाई? क्या वह जन-उम्मीदों पर खरी उतर पाई? जवाब जनता को नहीं, सपा सरकार को देना है। जनता तो चुनाव के समय अपनी ताकत दिखाती है। जब अखिलेश सरकार ने युवाओं को रोजगार दिलाने के वायदे किए थे, तब लगा कि यह युवा नेता अपनी राजनीति में रोजगार और विकास को प्राथमिकता देगा। लेकिन अब प्रदेश के नौजवान पूछ रहे हैं कि बीते दो वर्षों में किन-किन विभागों में कितने युवाओं को नौकरियां दी गईं? यह सच है कि नौकरियों के लिए विज्ञापन बहुत निकले, लेकिन अनुमानत: 95 प्रतिशत रिक्त पदों पर बहाली नहीं हुई। बस बेरोजगारों से आवेदन-पत्र के शुल्क भरवाए गए। जिन पैसों का दुरुपयोग लैपटॉप बांटने और सैफई महोत्सव में हुआ, उनसे प्रदेश की हालत बदल सकती थी।
विवेक राज सिंह, जौनपुर, यूपी

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