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पहचान लो अपने वसंत को

जहां प्रेम है, वहां प्रार्थना है। और जहां प्रार्थना है, वहां परमात्मा है। किसी की आंख में प्रीति से झांको, उसी का नाम उभर आएगा। किसी का हाथ प्रेम से हाथ में ले लो, उसी का नाम उभर आएगा। ऐसे तो उसका कोई भी नाम नहीं और ऐसे सभी नाम उसके हैं, क्योंकि वही है, अकेला वही है, उसके अतिरिक्त और कोई भी नहीं है। हम सब हैं उसी के अंग! न हम उसके बिना हैं, न वह हमारे बिना है। हम हो भी नहीं सकते थे उसके बिना। अंशी के बिना अंश कैसे हो सकेगा? और ध्यान रखना, दूसरी बात भी भूल मत जाना- अंश के बिना भी अंशी नहीं हो सकता। न तो भक्त के बिना भगवान है, और न भगवान के बिना भक्त। भक्त और भगवान के बीच जो घटता है, वही उसका नाम है। क्या घटता है? कहना कठिन। कभी कहा नहीं गया, कभी कहा भी न जा सकेगा। चुपचाप घटता है, मौन सन्नाटे में घटता है, अपूर्व शून्य में घटता है। और जब घट जाता है तो जीवन में आ  जाता है वसंत! खिल जाते हैं सारे फूल, जन्मों-जन्मों जो नहीं खिले थे। गीत झरने लगते हैं जीवन से, जो तुमने कभी कल्पना भी नहीं किए थे, जिनके तुम सपने भी नहीं देख सकते थे! तुम्हारा रोआं-रोआं किसी उल्लास से, किसी उत्सव से भर जाता है। अपरिचित, अनजाना उत्सव। लेकिन तलाश उसी की थी, खोज उसी की थी, टटोलते उसी को थे अंधेरे में, लंबी-अंधेरी रातों में, जन्मों-जन्मों में, न मालूम किन ग्रह-उपग्रहों पर, कितने-कितने प्रकारों से। नहीं जिसे देखा था, उसी को देखने की लालसा भटकाती थी। नहीं जिसे सुना था, उसी का मधुर स्वर कान में भर जाए, इसके लिए प्राण आतुर थे। नहीं जिसे चखा था, उसी की प्यास लिए चलती थी।

जिस दिन भक्त और भगवान के बीच शून्य का सेतु बनता है, उस दिन मिलन हुआ। उस दिन ही तुम जानोगे कि क्या उसका नाम है, या कि वह अनाम है? धर्म जब भी जीवित होता है, तब नाचता हुआ होता है। धर्म जब जीवित होता है तो हंसता हुआ होता है। धर्म जब जीवित होता है तो आंखों में आंसू भी आनंद के ही आंसू होते हैं। धर्म जब भी जीवित होता है तो पैरों में घुंघरु बंधते हैं, बांसुरी पर टेर उठती है, क्योंकि धर्म के जीवित होने का एक ही अर्थ हो सकता है- उत्सव। धर्म के जीवित होने का एक ही अर्थ हो सकता है- यौवन। धर्म जब युवा होता है तो कृष्ण जैसे लोग पैदा होते हैं। जीवन का उल्लास धर्म का सबूत है। और धर्म जब भी होता है, तब वह अपूर्व प्रेम की वर्षा अपने साथ लेकर आता है। जब भी आता है धर्म, जीवंत, सतरंगा होता है। पूरा इंद्रधनुष होता है। एक स्वर नहीं होता, पूरे सातों स्वर होते हैं।

जो वसंत को पहचान ले, वह वसंत के रंग में रंग जाता है। यहां वसंत आया है। डूबो इसमें! रंग जाओ इसमें! ऐसी घड़ी इतिहास में कभी-कभी होती है। जीवंत धर्म कभी-कभी उपलब्ध होता है। जब राख नहीं होती, अंगार होते हैं। लेकिन अंगार तो कुछ थोड़े-से साहसी लोगों को ही आकर्षित कर पाते हैं। इस देश को वसंत से भर देना है। यह बुद्धों की, सिद्धों की भूमि मुर्दों के हाथ में न पड़ी रह जाए। इसे वापस छीन लेना है मुर्दो से। इसे पंडितों-पुरोहितों से वापस छीन लेना है। इसे फिर जीते-जागते, गीत गाते, नाचते लोगों के हाथ में दे देना है। यह हो सकता है। कठिन तो बहुत है, मगर कठिन है, इसलिए करने योग्य भी है। इस देश के पास सूत्र हैं, जो सारे जगत को सौरभ से भर दें। इस देश के पास अपरिसीम विज्ञान है- अंतर का विज्ञान। पश्चिम ने बाहर के विज्ञान को पैदा कर लिया, आधा काम पश्चिम ने पूरा कर दिया है। हमने भीतर का विज्ञान पूरा कर लिया है, आधा काम हम बहुत पहले पूरा कर चुके हैं। अगर ये दोनों काम मिल जाएं तो पहली दफा पूरा मनुष्य पैदा हो और मनुष्य की अखंड संस्कृति पैदा हो।

अगर हम पुररुज्जीवित कर सकें बुद्ध, सरहपा, तिलोपा के विज्ञान को और पश्चिम के विज्ञान को। आइंस्टीन, न्यूटन, एडिंग्टन ने जो दान दिया है उसको। अगर ये दोनों मिल जाएं, अगर आइंस्टीन और बुद्ध का मिलन हो जाए तो मनुष्य के जगत में सबसे पहली.. पहली बार मनुष्य के पूरे इतिहास में एक ऐसी दुनिया होगी, जो बाहर-भीतर दोनों तरफ फूलों से भर जाए..।

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