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परम चेतना हैं मां सरस्वती

वसंत पंचमी को ज्ञानदायिनी, वीणा-पुस्तकधारिणी, समस्त विद्याओं, विधाओं, सुरों में व्याप्त मां सरस्वती प्रकट हुई थीं। वसंत पंचमी को मां सरस्वती के प्रकट होने के कारण इसे विद्या जयंती भी कहा जाता है। आज भगवान विष्णु और कामदेव की पूजा भी होती है। सृष्टि के आरम्भ में भगवान विष्णु की आज्ञा से प्रजापिता ब्रह्मा जी ने जीवों की रचना की। सृष्टि का सृजन तो हो गया, लेकिन ब्रह्मा जी इससे संतुष्ट नहीं हुए, उनको लगा कि उनकी रचना में कुछ कमी रह गई, जिसके कारण एक मौन की स्थिति पैदा हो गई है। तब विष्णुजी से आज्ञा लेकर ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से जल लेकर धरती पर छिड़का, जिसके चलते धरती में कंपन होने लगा। इसके बाद वृक्षों के बीच से एक अद्भुत व अलौकिक चतुर्भुज शक्ति प्रकट हुईं। शक्ति स्वरूपा इस देवी के एक हाथ में वीणा, एक हाथ वर मुद्रा में एवं अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। ब्रह्मा जी के अनुरोध पर जब देवी ने वीणा बजाई तो संसार के सभी जीवों में वाणी का संचार हो गया। जलधारा में कोलाहल व पवन के वेग में सरसराहट पैदा हो गई। तब ब्रह्मा जी ने इस देवी को सरस्वती कह कर पुकारा।

मां सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती शारदा, वीणावादिनी सहित अनेक नामों से पुकारा जाता है। विद्या और बुद्धि की प्रदाता मां सरस्वती को संगीत की देवी भी कहा गया है। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है- प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवस्तु॥ अर्थात ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हमारे भीतर जो मेधा है, उसका आधार भगवती शारदा ही हैं। मां शारदा के अद्भुत स्वरूप का स्तुति के रूप में कुछ इस तरह वर्णन किया गया है- ‘या कुन्देन्दुतुषार हार धवला, या शुभ्र वस्त्रवृत्ता।
या वीणा वर दण्ड मंडितकरा, या श्वेत पद्मासना॥’
पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने मां सरस्वती को वरदान दिया था कि आज के दिन सच्चे मन से जो भी तुम्हारी आराधना करेगा, वह विद्वान एवं गुणवान बन समस्त संसार को प्रकाशित करेगा। वसंत पंचमी से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। त्रेतायुग में जब रावण ने माता सीता का हरण कर लिया, तब भगवान श्रीराम उन्हें ढूंढ़ते हुए अनेक स्थानों पर गए। उन्हीं में से एक स्थान था- दंडकारण्य, जहां शबरी नाम की एक भीलनी रहती थी। भगवान श्रीराम जब उसकी कुटिया में पधारे, शबरी अपनी सुध-बुध खो बैठी और उसने अपने झूठे बेर भगवान को खिलाए। भक्त-भगवान का वह अद्भुत मिलन वसंत पंचमी के दिन ही हुआ था। दंडकारण्य का ये क्षेत्र गुजरात व मध्य प्रदेश में फैला हुआ है। इस क्षेत्र के वनवासी आज भी एक शिला को भगवान श्रीराम का स्वरूप मान कर पूजते हैं।

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