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पूरी सृष्टि कर्म पर ही आधारित

कर्म का विधान क्या है, इसकी महत्ता क्या है? कर्मों का फल कैसे निर्धारित होता है?
-राम स्वरूप, बलिया, उत्तर प्रदेश
जब आप बीज बोते हैं तो फसल की गुणवत्ता धरती की उर्वरता पर निर्भर करती है। ऐसे ही हमारा प्रत्येक कर्म, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, फलीभूत होने की क्षमता रखता है और इसका फल इस पर निर्भर करता है कि वह कर्म कहां व कैसे किया गया है। अक्सर कहा जाता है कि किसी आध्यात्मिक पुरुष के प्रति हमारे विचार नकारात्मक नहीं होने चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं है कि ऐसे महापुरुष अहम से ग्रसित होते हैं, बल्कि यौगिक साधनाओं से इन व्यक्तियों की ऊर्जा अधिक सूक्ष्म व शक्तिशाली हो जाती है। इसलिए इन महापुरुषों के प्रति आपके किसी भी कर्म का फलीभूत होना, उनके आध्यात्मिक स्तर पर निर्भर करता है। यह सब जानते हैं कि हम इस दुनिया में खाली हाथ आए हैं और खाली हाथ ही जाएंगे। सिकंदर ने अपने अंतिम समय में यह इच्छा प्रकट की थी कि उसकी अंतिम यात्रा के दौरान उसके हाथों को ढका न जाए, ताकि लोग यह समझ सकें कि इस दुनिया में हर कोई खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही लौट जाता है।

आप किसी योगी को ऐसा विचार प्रकट करते हुए कभी भी नहीं देखेंगे, क्योंकि योगी को इस बात का ज्ञान होता है कि वह इस संसार में अपने साथ क्या लाता है और क्या लेकर जाता है। और यह है- कर्म। एक जीवित मनुष्य और आत्मा रहित शरीर के वजन में अंतर होता है। यह अंतर आत्मा के कारण नहीं, बल्कि कर्मों के कारण होता है। वैदिक ऋषियों को कर्म के विधान का पूर्ण ज्ञान था। वे जानते थे कि आत्म साक्षात्कार केवल तभी संभव है, जब आप स्वयं को पूरी तरह स्थिर कर लेते हैं। यह स्थिरता तभी प्राप्त होगी, जब सनातन क्रिया व अष्टांग योग द्वारा कर्मों की तरंगों को शांत कर लिया जाए। यह स्थिति शून्यता की होती है, जिसे समझा नहीं जा सकता। इसका तो केवल अनुभव ही किया जा सकता है। यही उस आनंद की स्थिति है, जो स्थायी है।

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