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टीचर्स को बनना होगा फ्रेंडली

टीचर्स को बनना होगा फ्रेंडली

जनवरी बीतते ही छात्रों पर बोर्ड परीक्षा की तैयारी को अंतिम रूप देने का दबाव हावी होने लगता है। इस चक्कर में छात्र जी-जान से तैयारी अथवा रिवीजन में लग जाते हैं। कभी सिलेबस पूरा न हो पाने का तनाव रहता है तो कभी दूसरे साथी की तैयारी देख कर मन घबराता है। ये सारी चीजें बच्चों की मनोदशा पर गहरा प्रभाव डालती हैं। 

छात्रों से मित्रवत् व्यवहार रखें
पिछले कुछ वर्षों से सीबीएसई सहित कई बोर्डो ने अपने पैटर्न में काफी बदलाव किए हैं। इससे छात्रों को काफी फ्रेंडली माहौल मिल रहा है। टीचर्स की भूमिका भी इन दिनों फेंड्रली हो तो बच्चों की तैयारी रंग लाती है। वे कुछ दिनों तक यह भूल जाएं कि वे टीचर्स की भूमिका में हैं। यदि वे छात्रों से मित्रवत् ढंग से पेश आएंगे तो बच्चा उन्हें अपनी हर परेशानी बताएगा।

गाइड की भूमिका का करें निर्वाह
इस समय टीचर्स की जिम्मेदारी दबाव बनाने की स्थिति में न होकर खुशनुमा माहौल में होनी चाहिए। यदि बच्चा तैयारी की दिशा में कुछ लापरवाही बरत रहा है तो उसके साथ थोड़ी-सी सख्ती से पेश आ सकते हैं। इस क्रम में बच्चों की प्लानिंग, टाइम टेबल, खानपान आदि की व्यवस्था पर अपनी राय दे सकते हैं।

बच्चे का हमेशा उत्साह बढ़ाएं 
इस समय बच्चे को भावनात्मक सहारे की विशेष जरूरत पड़ती है। यदि आप हमेशा उसका उत्साह बढ़ाते रहेंगे तो वह आपको कभी निराश नहीं करेगा। कुछ बच्चे टीचर्स की देखरेख में ही अच्छा रिजल्ट देते हैं।

प्री बोर्ड के नतीजे को बनाएं आधार
प्री बोर्ड परीक्षा में छात्र की क्या उपलब्धि रही, इसका ज्यादा असर मुख्य परीक्षा पर पड़ता है। यदि नंबर कम आएं हैं तो उसे डांटने की बजाए आत्ममंथन करें कि बच्चे की कमजोरी कहां से है और उसके नंबर कम क्यों आए ?

हर छात्र की कुछ कमजोरी और ताकत होती है। यह जानने का प्रयास करें कि छात्र खुद को कहां कमजोर महसूस कर रहा है।

प्रतिदिन की उपलब्धियां जांचें
टीचर्स यह जांच करें कि छात्र की आज की क्या उपलब्धि रही। अब तक जो होमवर्क बच्चे को दिया जा रहा है, वह उसे पूरा करने में कितनी दिलचस्पी ले रहा है या आपने उससे जो उम्मीदें की हैं, वह उसमें कितना खरा उतर रहा है। यदि इन दिनों में छात्र को कुछ दिक्कत आ रही है तो टीचर्स उसे गंभीरता से लें और हल निकालने का प्रयास करें।

पूर्व के नतीजों की उलाहना न दें
जाने-अनजाने में बच्चा यदि प्री बोर्ड अथवा क्लास टेस्ट में अच्छे अंक नहीं ला पाया है तो इसके लिए उसे कतई न कोसें, क्योंकि बार-बार कोसने से आप फायदे की बजाए उल्टे उसका नुकसान ही करेंगे। बार-बार कमेंट करने से बच्चे के अंदर तनाव पनपता है। हां, आप बच्चे की कमी को अवश्य बता सकते हैं। संभव है कि बच्चा अपनी कमी को भांपते हुए उसे तत्काल दूर कर ले।

किसी अन्य से तुलना न करें
यदि उसके साथ पढ़ने वाले किसी बच्चे के प्री बोर्ड अथवा क्लास टेस्ट में अधिक अंक आए हैं तो तुलनात्मक रवैया न अपनाएं। इससे बच्चा हीनभावना से ग्रसित होगा और बार-बार एहसास करा कर आप उसके प्रदर्शन को अच्छा करने की बजाए गिराते जाएंगे।

पेरेन्ट्स मीटिंग आयोजित करें
बच्चों की तैयारी अथवा प्रगति से उनके पेरेन्ट्स को भी अवगत कराते रहें। चाहें तो इसके लिए 15 दिनों या एक सप्ताह में पेरेन्ट्स मीटिंग का आयोजन कर सकते हैं। इससे पेरेन्ट्स को भी यह भरोसा रहेगा कि उनका बच्चा टीचर्स के सान्निध्य में अच्छा कर गुजरेगा।                                             

खुद तनाव में न रहें और न बच्चों को दें
यह समय टीचर और छात्र दोनों के लिए काफी अलार्मिंग होता है। टीचर्स के पास अब जो भी समय शेष है, वे उसका सदुपयोग करते हुए बच्चों के हित में लगाएं। जो भी टॉपिक अधूरा है, उसे तत्काल पूरा कराते हुए उन्हें रिवीजन की दिशा में अग्रसर करें। उन्हें परीक्षा के पैटर्न से भली-भांति वाकिफ कराते हुए सैंपल पेपर हल कराते रहें। इससे उनका मनोबल बढ़ेगा। एक बार सही रूटीन अथवा टाइम टेबल बन जाने के बाद अचानक  उसमें कोई बड़ा बदलाव न लाएं, क्योंकि इससे छात्र का पूरा मैनेजमेंट सिस्टम ही बिगड़ जाएगा।
चारू कपूर, प्रिंसिपल,
गंगा इंटरनेशनल स्कूल, दिल्ली

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