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निवेश की दुविधा

च्चे तेल की कीमतों में उछाल, अमेरिकी मंदी की दस्तक और महंगाई के बेकाबू जिन्न ने एक ऐसा चक्रव्यूह रचा है, जिसमें आम निवेशक अपने आपको गहरी उलझन में फंसे महसूस कर रहे हैं। यह चक्रव्यूह तोड़ना न तो सरकार के लिए आसान है, न ही उद्योग जगत के वश में- बेचार साधारण निवेशकों की बिसात ही क्या? उनके सामने अपनी बचत के निवेश के विकल्प इतने सीमित रह गए हैं कि मुद्रास्फीति की बेहद ऊंची दर की भरपाई हो पाना भी मुश्किल है। पिछले कुछ समय से शेयर बाजार ने रसातल की दिशा पकड़ ली है। बैंकों की सावधि जमाओं व लघु बचत योजनाओं की ब्याज दरें मुद्रास्फीति दर से काफी नीचे हैं। सोने का भाव शिखर पर हैं। जमीन-ाायदाद व कंस्ट्रक्शन से जुड़ी कंपनियों के शेयर जमीन सूंघने के बावजूद मकानों की ऊंची कीमतें ज्यादा नीचे नहीं आ रही हैं। ऐसे में दीर्घकालिक या लघुकालिक निवेश के लिए किस क्षेत्र में हाथ आजमाएं, यह भविष्यवाणी करना खतरों से खाली नहीं। फिर भी, यह समझना मुश्किल नहीं है कि ऐसे हालात पहली बार पैदा नहीं हुए हैं। निवेश के मौजूदा निराशाजनक हालात चक्रीय मामला भी है और आज नहीं तो कल दिन बदलेंगे की उक्ित के अनुसार माहौल सुधरने की आस लगाना बेबुनियाद नहीं। विगत के इन अनुभवों के मद्देनार विवेकशील लोग कुछ समय तक देखो और इंतजार करो का रवैया अपनाते हैं। उसके बाद विभिन्न विकल्पों में थोड़ा-थोड़ा निवेश करते जाते हैं। इस नजरिए में भी जोखिम या खतर के सवाल उठाए जा सकते हैं, पर अर्थशास्त्र का नियम यही कहता है कि जितने अधिक फलदायी विकल्पों में निवेश करंगे, उतना ही अधिक जोखिम रहेगा। यानी सबक यह है कि घबराने के बजाय उचित मौके का इंतजार करना चाहिए और फलदायी निवेश के लिए जोखिम से बचा नहीं जा सकता। यह सावधानी भी जरूरी है कि भेड़चाल में न बहें और किसी भी क्षेत्र-विकल्प में निवेश की बारीकियों को अपेक्षित रूप से समझे बिना कदम आगे न बढ़ाएं, वर्ना शेयर बाजार जसे क्षेत्र में हाथ जलाने और आंसू बहाने के अलावा कुछ हासिल नहीं होता।ड्ढr बैंक सावधि जमाओं, म्युचुअल फंड, लघुबचत योजनाओं, बीमा योजनाओं आदि में आय भले ही कम हो, पर वे अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं। शेयर बाजार की दिशा फिलवक्त अस्थिर है, क्योंकि बढ़ती महंगाई, खतर में न्यूक्िलयर डील, मंदी की दस्तक के संकेत यही बयां करते हैं।

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