DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

अंकों की सीमा

एक सवाल जो अक्सर पूछा जाता है कि आखिरकार एथलेटिक्स में बेहतर होते रिकार्डस कहाँ जा कर रुकेंगे? मतलब यह कि इंसान कितना तेज दौड़ सकता है या कितना वजन उठा सकता है इसकी कोई सीमा होगी या नहीं होगी? इसी किस्म का सवाल हर साल कॉलेज में भर्तियों का मौसम शुरू होने पर उठता है कि हर साल बढ़ते कट ऑफ प्रतिशत की क्या सीमा होगी? इस साल खबर है कि दिल्ली के कुछ प्रतिष्ठित कॉलेजों में कुछ पाठय़क्रमों में 0 अंक लाने वाले छात्रों का भी दाखिला नहीं हो पाएगा। ऐसे पाठय़क्रमों में करीब सवा दो सौ ऐसे छात्रों ने फॉर्म भर हैं जिनके प्रतिशत से ज्यादा अंक हैं और तकरीबन 4000 छात्र ऐसे हैं जिनके 0 प्रतिशत से ऊपर लेकिन प्रतिशत से कम अंक हैं। जाहिर है 0 से प्रतिशत के बीच वाले सार छात्रों को अपने पसंदीदा कॉलेज में पसंदीदा पाठय़क्रम में दाखिला मिलने से रहा। यह मामला गंभीर इसलिए है कि यह शिक्षा में अंक प्रतिशत के लिए बढ़ती जा रही होड़ को दर्शाता है। ज्यादा अंक पाने का दबाव परिवारों के जीवन पर प्रतिकूल असर डालता है और बच्चों की रचनात्मकता और बहुमुखी विकास के लिए भी बाधक है। यह परिस्थिति हमार यहाँ छात्रों की तादाद के अनुपात में उच्च शिक्षा संस्थानों की कमी को दर्शाती ही है, लेकिन दूसरी ओर इस बात की ओर भी इशारा करती है कि हमारी शिक्षा प्रणाली में बुनियादी बदलाव की जरूरत है। कट ऑफ प्रतिशत का बढ़ते जाना हमारी मौजूदा शिक्षा और परीक्षा प्रणाली पर बढ़ते बोझ का सूचक है और इस बात का भी और बोझ यह प्रणाली और छात्र बर्दाश्त नहीं कर सकते। अब वक्त है कि एक-एक अंक की मारामारी से छात्रों को बचाने की गंभीर कोशिश की जाए। यह इसलिए भी जरूरी है कि प्रतिशत अंक लाकर ऊंचे कॉलेज में अच्छे पाठय़क्रम में दाखिला ऊंची नौकरी की गारंटी है लेकिन समाज को किसी सार्थक अवदान की नहीं। माँ-बाप और बच्चों के लिए इस मौसम में आइंस्टाइन, महात्मा गांधी से लेकर बिल गेट्स जसे लोगों को याद करना मुफीद होगा, जो वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में असफल रहे थे।ड्ढr

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: अंकों की सीमा