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हम उड़ नहीं सकते!

‘कसौली’ के ऊंचे शिखरों में एक है ‘मंकी प्वाइंट’। तुलसी की चौपाइयों से सजी शिलाओं की सीढ़ियाँ शिखर की ओर बढ़ने की प्रेरणा देती हैं। ऊपर पहुंचते ही अनायास सारी थकान मिट जाती है। छोटा सा मंदिर और उसके आगे विराट चरण के आकार का, आगे से चौड़ा, पीछे से संकरा, सपाट पहाड़। मिथक के अनुसार मारुतिनन्दन ने, संजीवनी अभियान के दौरान पलभर को यहां एक पैर टिकाया था। उन्हीं के पैर का निशान इस शिला पर अंकित हो गया। इस मिथकीय घटना-स्थल को अंग्रेजों ने मंकी प्वाइंट नाम दे दिया। इसे अब तक ‘हनुमान-चरण’ या ‘हनुमान प्वाइंट’ क्यों नहीं कहा जा सका? यहां कुछ ही क्षणों में रुई के से बादल घिर आते हैं। चारों ओर वादी पूरी तरह ढक जाती है। ऊपर बादल, नीचे बादल और बीच में मनुष्य। एक आलौकिक अनुभव से गुजरता है इंसान। पूरी कायनात एक हो जाती है। हमारी सत्ता उसी में विलीन होती दिखाई पड़ती है। इसी स्वर्गिक वातावरण में समा जाने का मन करता है।ड्ढr दूसर शिखरों पर उगते और डूबते सूरा के संकेत स्थल हैं। पौ फटते ही आकाश की लालिमा और गहरी वादियों में खड़े देवदार, हवा में घुली हवन सामग्री की सी खुशबू की पृष्ठभूमि में, पेड़ों से चिपके झींगुर समवेत स्वर में जसे ऋचाओं का पाठ करते हों। पत्थरों की छाती फाड़कर जड़ें जमाए हुए देवदार, आसमान को छूने की फिराक में रहते हैं। तेज हवाएं इनका कुछ नहीं बिगाड़ पातीं।ड्ढr ‘कसौली’ की तुलना में अन्य पहाड़ बड़े शहरों की तरह प्रदूषित हो गए हैं। गाड़ियों का शोर और धुआँ, प्लास्टिक की थैलियाँ, टीन के डिब्बे, प्रकृति के आंचल को मैला करते रहते हैं। इसीलिए जगह-ागह तख्तियाँ लगा दी गई हैं-पर्यटकों को आगाह करने के लिए। अंग्रेजी में लिखी ये काव्यात्मक पंक्ितयां पढ़ने लायक हैं। भाव है- शुक्र है इंसान उड़ नहीं सकता, नहीं तो आसमान भी होता कूड़ा घर धरती की तरह।ड्ढr

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