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जिन्होंने नरेंद्र मोदी को गढ़ा

मुझे राहुल गांधी के इंटरव्यू पर लिखना चाहिए, लेकिन यह बोरियत भरा होगा। कभी-कभी विपक्ष की तरफ जाने से मदद मिलती है। अगर हम ओपीनियन पोल को देखें, तो पिछले कुछ साल से समय के साथ-साथ ये सटीक होते जा रहे हैं। इन ओपीनियन पोल के हिसाब से अप्रैल में होने वाले आम चुनाव में नेहरू-गांधी परिवार के लिए ज्यादा संभावना नहीं है। वे लोग भले ही अपने अच्छे कामों के बारे में कुछ भी सोचते हों, लेकिन डर यह भी है कि इस बार उनकी पार्टी को सौ सीट भी हो सकता है, न मिल पाएं। अर्थव्यवस्था के सबसे तेज विकास का दौर, और अच्छा विधायी रिकॉर्ड, ये सब अच्छी चीजें हो सकती हैं, लेकिन भारतीय चुनावों में ये सब बहुत बड़ा मुद्दा नहीं बन पातीं, इसलिए अगर करारी मात होती है, तो मुझे हैरत नहीं होगी। इसलिए अब हम उस पर ध्यान देते हैं, जिसके जीतने की संभावना है। मैं नरेंद्र मोदी की किताब ज्योतिपुंज का अनुवाद कर चुका हूं, जिसमें उन्होंने अपने गुरुओं की काफी प्रशंसा की है। इन लोगों में ज्यादातर मराठी ब्राह्मण थे, ज्यादातर गुजरात में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मध्यम दर्जे के कार्यकर्ता थे। ये सब लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं, मगर इन्हीं लोगों ने मोदी को सिखाया और गढ़ा। हमें इस किताब को गंभीरता से लेना होगा, क्योंकि यह नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने के कई साल बाद लिखी गई।

यह किताब उनके अतीत को बताती है और उन लोगों के बारे में बताती है, जिन्होंने उनको प्रभावित किया, लेकिन यह उनके मौजूदा नजरिये से लिखी गई किताब है। मोदी जब 17 साल के थे, तो वह संघ के पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए थे। वह इतने प्रतिभाशाली थे कि 24 वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते उन्हें अहमदाबाद का प्रचारक बना दिया गया। जब वह 20 साल के थे, तो जिन्होंने उन्हें तीसरे साल का प्रशिक्षण दिया और जिनके साथ वह रहते थे, वह थे मधुकर राव भागवत। मौजूदा सरसंघ चालक मोहन राव भागवत के पिता। जब मैंने इस किताब को पढ़ा, तो मेरे मन में पहली बात यह आई कि काश! मोदी ने इन लोगों से वास्तव में कुछ सीखा होता। इस मसले पर हम बाद में आएंगे, पहले हमें उनके फर्क को देखना होगा। डीलडौल के हिसाब से उनके मेंटर छोटे और इकहरे बदन के। हालांकि मोदी खुद के 56 इंच के सीने की बात करते हैं, लेकिन मेरे हिसाब से उनकी कमर 40 की होगी।

इसकी वजह शायद यह है कि मोदी अपनी खान-पान की आदतों में उन लोगों की तरह सादगी नहीं बरतते। फिर आता है कपड़े पहनने का अंदाज। यहां तो जैसे वे बिल्कुल अलग-अलग छोर पर हैं। मोदी उनके बारे में लिखते हैं, ‘वे किसी सूफी (औलिया) जैसे पूरी तरह से बेपरवाह रहते थे। बालों में कंघी नहीं, कपड़ों की चिंता नहीं, बहुत ही मोटे शीशे वाले चश्मे, पैरों में टूटी चप्पलें.., उनकी हर चीज इसी तरह थी।’ बेशक, खुद मोदी इसके दूसरे किनारे पर हैं। संघ के लोगों का वह बेपरवाह जीवन मोदी के कहीं पास से भी नहीं गुजरा है। उन लोगों के तौर-तरीकों में कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी। उन लोगों ने अपना पूरा जीवन सेवा और त्याग में ही लगा दिया था। उन्होंने आरामदेह पारिवारिक जिंदगी जीने की बजाय संघ की खातिर गरीबी में जीना ही पसंद किया।

कुछ तो अपने साथ अपने परिवार को भी इसी गरीबी में ले आए। मोदी ने लिखा है कि ये लोग अपनी अंतरात्मा की आवाज से चलते थे, क्योंकि यही संघ की जीवन शैली है। ‘संघ में ऐसी कई चीजें हैं- सामूहिक आत्मविश्लेषण, सामूहिक जिम्मेदारी, सामूहिक निर्णय प्रक्रिया। कई मामलों में यही संघ की असली ताकत है, इसीलिए इसकी बैठकों में इतना समय दिया जाता है।’ मोदी का यह भी कहना है कि ये बैठकें उन्हें बहुत बोरियत भरी लगने लगती थीं। इससे यह भी पता चलता है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने सहमति बनाने के तरीके से क्यों पल्ला झाड़ लिया? लेकिन नरेंद्र मोदी और उन लोगों के बीच सबसे बड़ा फर्क है- सत्ता के प्रति उनके नजरिये का। वे लोग मानते थे कि अगर समाज को बदलना है, तो हर किसी को भीतर से बदलना होगा। जो समस्याएं सांस्कृतिक हैं, उनके समाधान के लिए वे सत्ता से कोई मदद नहीं लेना चाहते थे। इस मामले में मोदी ने पिछले एक दशक से संघ से नाता तोड़ लिया है। ऊपर से ही सारे बदलाव करने का उनका वायदा उन लोगों को काफी परेशान कर देता है, जिनकी वह प्रशंसा करते हैं।

हैरत की बात यह नहीं है कि इस किताब में मोदी नैतिकतावादी दिखते हैं और वह उन लोगों को नापंसद करते हैं, जिन्होंने ‘सांस्कृतिक क्लब बना रखे हैं, जो ताश खेलते हैं और सिगरेट पीते हैं।’ बौद्धिक रूप से उनका दिमाग बंद रहता है, जब वह कहते हैं कि वही किताबें पढ़ने के लिए ली जानी चाहिए, जो राष्ट्रीयतावाद की प्रेरणा देती हों और जिनमें ‘राष्ट्र वंदना’ हो। वह क्षेत्रीयतावादी हैं और मधुकर राव को ‘गुजराती’ कहते हैं, क्योंकि संघ के उस नेता का कहना था कि वडोदरा में रहने वाले मराठी स्वयंसेवकों को अपनी मातृभाषा की बजाय राज्य की भाषा में बात करनी चाहिए। मोदी बहुत अच्छे और स्पष्ट ढंग से गुजराती बोलने के कारण मधुकर राव को काफी पसंद करते हैं। साथ ही वह संघ के एक और नेता वासुदेव राव तलवालकर की सुंदर काठियावाड़ी लहजे वाली गुजराती को भी पसंद करते हैं। एक चीज उन लोगों और नरेंद्र मोदी में समान है, या शायद नरेंद्र मोदी ने उनसे सीखी है, वह है अच्छे ढंग से बोलने का तरीका। प्राणलाल दोषी (जिन्हें राष्ट्रीय स्वयंयेवक संघ के लोग पप्पाजी कहते हैं) के बारे में मोदी लिखते हैं, ‘वह बेहतरीन वक्ता थे। वह इतने आसान, सटीक और स्पष्ट ढंग से बात रखते थे कि उनके शब्द भले ही गायब हो जाएं, लेकिन उनका संदेश आपके दिमाग में अंकित हो जाता था।’ इसीलिए मुझे लगता है कि काश! नरेंद्र मोदी ने उन लोगों से कुछ और गुण हासिल कर लिए होते।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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