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ताकि जरूरी दवा से कोई वंचित न रहे

आंकड़े बताते हैं कि देश की आधी से अधिक आबादी को जरूरत पड़ने पर जरूरी दवाएं नहीं मिल पातीं, बावजूद इसके कि उन्हें ये दवाएं मिलनी चाहिए। इस मसले पर सभी में सहमति है। बीमारी के इलाज पर खर्च के कारण गरीबी के जाल में फंसने वाले लोगों की संख्या भी सबसे अधिक हमारे देश में ही है। और इलाज में दूसरी चीजों के मुकाबले ज्यादा खर्च दवाओं पर ही होता है। पिछले साल मई में सरकार ने जरूरी दवाओं की कीमत को कम करने की एक कोशिश की थी। जिससे कई जरूरी दवाएं तो मूल्य नियंत्रण के तहत आ गईं और कई छोड़ दी गईं। समस्या यह है कि आज अधिकांश दवाएं कांबिनेशन में बिक रही हैं और कांबिनेशन को इस आदेश में छोड़ दिया गया। यानी लगभग 80 प्रतिशत दवाएं आदेश से बाहर रह गईं। एक और समस्या यह हुई कि कीमत नियंत्रण का पुराना फॉर्मूला छोड़ दिया गया। पहले दवा उत्पादन के खर्च में पैकिंग, वितरण और मुनाफे के मार्जिन वगैरह को जोड़ा जाता था। अब मुख्य ब्रांड की दवाओं का औसत निकालकर उसमें निश्चित मार्जिन जोड़ा जा रहा है।

इस नए फॉर्मूले से कुछ दवाओं की कीमत उनके उत्पादन खर्च से कई गुना हो गई। ऐसी विसंगतियों को दूर करने के साथ ही यह भी जरूरी है कि सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में गरीबों के लिए ज्यादा से ज्यादा दवाएं नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाएं। राजस्थान और हिमाचल प्रदेश की सरकारों ने जेनरिक दवाओं को ही खरीदने और मरीजों को देने का जो फैसला किया, उससे इन सरकारों का दवाओं पर होने खर्च काफी कम हुआ है। अब इस तरीके को पूरे देश के पैमाने पर अपनाने की जरूरत है। पेटेंट कानूनों की वजह से कई दवाएं महंगी हुई हैं और कुछ तो इतनी महंगी हैं कि गरीब ही नहीं, मध्य वर्ग और यहां तक कि उच्च मध्यवर्ग के लिए भी उनका इस्तेमाल काफी बड़ी समस्या है। इस पेटेंट कानून में बदलाव की मांग दुनिया भर में चल रही है। लेकिन कुछ नई दवाएं ही इसकी वजह से महंगी हैं। बाकी ज्यादातर दवाएं जेनरिक रूप में काफी सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। इसके साथ ही सरकार सुलझे हुए पारदर्शी तरीकों से दवाओं की खरीद करती है, तो अनेक दवाएं बाजार से कई गुना सस्ती कीमत पर सरकार को उपलब्ध हो जाती हैं।

मरीजों को नि:शुल्क दवाएं देने का मामला उतना आर्थिक नहीं है, जितना कि यह राजनीतिक इच्छाशक्ति का मामला है। लोगों को नि:शुल्क दवाएं देने के मामले में गैर सरकारी संगठनों, धार्मिक संगठनों और तरह-तरह की दानदाता संस्थाओं की भी मदद ली जा सकती है। स्वास्थ्य के मामले में हमारी सोच यह होनी चाहिए कि हर किसी को स्वस्थ जीवन देना समाज की जिम्मेदारी है। सरकार को यदि हमें प्रशासनिक तंत्र बनाने की बजाय सामाजिक व्यवस्था का सेवादार बनाना है, तो सबको स्वस्थ बनाने की जिम्मेदारी भी सरकार को स्वीकारनी होगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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