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मफलर बांधने की राजनीतिक कामना

अपनी-अपनी विशेषता है। कुछ पढ़ाई में निपुण हैं, तो कुछ नकल में। इसी तरह कुछ गांधी के सैद्धांतिक शिष्य हैं, तो कुछ उनके नकलची। गांधी के अहिंसा, सत्याग्रह, अनशन में अन्ना का यकीन है। ‘अन्न-शन’ में तो दुनिया में कोई उनका सानी नहीं। उसमें उनका साथ निभाना कठिन है, टोपी पहनना आसान। सिर्फ टोपी पहनकर लोग गांधी बन सकते, तो हर शहर में गांधी टोपी की फैक्टरी होती। अन्ना का एक चेला भी कम नहीं है। उसने बिना बहुमत के सत्ता पाकर इतिहास बनाया, फिर अपनी सरकार द्वारा धरना देकर। वह हमारे ऐसे पढ़े-लिखे बेकार नौजवानों का आदर्श है। हमें इंतजार है कि हमें रोजगार दिलवाने को वह केंद्र सरकार से पत्र-व्यवहार करे। सुनवाई न होने पर धरना देना तो उसका जन्मसिद्ध अधिकार है। हम उसे आश्वस्त करते हैं कि इस बार का धरना, उसे और उसके मफलर को राष्ट्रव्यापी ख्याति दिलाकर रहेगा।

सिर पर लिपटा, कानों और गले पर बंधा मफलर सिर्फ सर्दी से बचाव का साधन नहीं है, बल्कि यह नई संस्कृति का फैशन और नेता की पहचान भी है। कौन जाने, कल धरना-स्थल मफलर मार्ग से मशहूर हो! अपना इरादा तो वहां मफलर का एक स्टॉल लगाने का है। मफलर सरकार अपवाद है, वरना अंधापन-बहरापन तो व्यवस्था की नियति है। ऐसे में, युवाओं के रोजगार का प्रश्न अनिर्णय के आश्रय में भटकता रहेगा। हमें यकीन है। फैसला तो टोपी-मफलर प्रमुख को ही लेना है। उसने खुद सरकारी नौकरी को लात मारकर नाम कमाने का कीर्तिमान बनाया है। क्यों न वह होनहार नौजवान के लिए एनजीओ ही खुलवा दे? महिला सुरक्षा के मुद्दे में काफी संभावनाएं हैं। घर, स्कूल, कॉलेज, बाजार, मोहल्ले आदि जगहों पर स्वैच्छिक संस्थाओं की सक्रियता और निगरानी वांछनीय ही नहीं, आवश्यक भी है। मफलर में बसे मच्छर का एक इशारा ही देसी-विदेशी दान-अनुदान का खजाना खुलवाने के लिए काफी है। मफलर महान के समान हमें भी अपनी सरकारों की विश्वसनीयता पर संदेह है। अपना वायदा है। जीवन र्पयत हम न मफलर को तजेंगे, और न उनके मफलर-ब्लफलर दल-बल को।

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