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जबान क्यों फिसलती है

ऐसा कई बार होता है कि आप कुछ कहना चाहते हैं और कुछ अलग ही कह जाते हैं। बाद में क्षमा मांगते हैं कि माफ करना जबान फिसल गई। या लोग कहते हैं, मेरे मुंह से निकल गया। यह मैं नहीं कहना चाहता था, और मैं कह गया। लेकिन जबान यूं ही नहीं फिसलती, जबान फिसलने के पीछे गहरा मनोविज्ञान है। फ्रायड का कहना है कि जबान ऐसे ही नहीं चूकती है। आप भूल से भी कुछ कहते हैं, तब वह भी बहुत गहरा और सोचने जैसा है कि वैसा क्यों हुआ? उसके होने के पीछे आपका अवचेतन है। यह बात आगे ‘फ्रायडियन स्लिप’ के नाम से मशहूर हुई। फ्रायड ने अपनी किताब द सायकोथेरेपी ऑफ एवरीडे लाइफ में कहा है कि ये छोटी-छोटी गलतियां अवचेतन मन की झलक दिखाती हैं। जो विचार या भाव लोग अंतर्मन में दबा देते हैं, वे बोलने के दौरान इस तरह निकल पड़ते हैं।

इसका उदाहरण ओशो देते हैं मुल्ला नसरुद्दीन की कहानी से। नसरुद्दीन के घर एक दोस्त आया। दोस्त के पास अच्छे कपड़े नहीं थे और उन्हें एक दावत में जाना था, सो मुल्ला ने दोस्त को अपने कपड़े पहनने के लिए दिए। वे कपड़े दोस्त पर बहुत जंच रहे थे और उसके सामने मुल्ला फीका लग रहा था। मुल्ला मन ही मन जल-भुन उठा था। पार्टी में उन्होंने दोस्त का परिचय दिया, ‘ये हैं मेरे दोस्त, बहुत विद्वान हैं और कपड़े भी उन्हीं के हैं।’ दोस्त को कपड़े देकर नसरुद्दीन पछता रहा था और वह उसके मुंह से प्रगट हो रहा था।

कभी-कभी दबा हुआ भाव इस तरह अनायास ही निकल पड़ता है। मेरी एक मौसी के दो बेटे थे- मुकुंद और वसंत। वसंत छोटा था, लाड़ला था, पर उनसे दूर रहता था। वह हमेशा मुकुंद को पहले वसंत कहकर पुकारतीं और बाद में मुकुंद कहतीं। फिर कहतीं, जबान फिसल गई। जब जबान फिसले, तो अपने मन की खोज करें कि भीतर क्या दबा पड़ा है?

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