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निष्पक्ष की पक्षधरता

आप वैचारिक पक्षधरता के बावजूद अपने चिंतन में तार्किक और संतुलित होने की कोशिश कर सकते हैं। दरअसल बगैर किसी वैचारिक फ्रेमवर्क के सामाजिक यथार्थ के अनेक पहलू हमारी आंखों से ओझल ही रहते हैं- जैसे मार्क्स के पास वह नारीवादी फ्रेमवर्क नहीं था, जिससे श्रम के अनेक रूपों के साथ-साथ वह घरेलू श्रम को भी पहचान पाते। शायद इसीलिए श्रम का यह रूप उनकी आंखों से ओझल ही रहा। इस दृष्टि से देखें, तो विशुद्ध निरपेक्षता या तटस्थता या तो कपट है या अनजाने में उस वैचारिक फ्रेमवर्क का सहज स्वीकार, जिसका समाज में दबदबा है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें, तो मुझे पिछले पंद्रह वर्षों में टीवी पर आयोजित अनेक परिसंवादों का ध्यान आता है, जिनमें सुरजीत भल्ला, विवेक देबरॉय, लार्ड मेघनाथ देसाई आदि को अर्थशास्त्री या निष्पक्ष राजनीतिक चिंतक के तौर पर पेश किया जाता रहा है और सीताराम येचुरी आदि को पार्टी विशेष का प्रवक्ता के तौर पर।

प्राय: इन बहसों में निष्पक्ष चिंतकों को राजनेताओं की तुलना में अधिक कट्टर वैचारिक आग्रहों के साथ बहस करते हुए सुना-देखा जा सकता है। कट्टरता सिर्फ कथ्य के स्तर पर नहीं, बल्कि भाषा, हाव-भाव के मामले में भी दिखलाई पड़ती है। रवीश कुमार ने पिछले सप्ताह अपने दो कार्यक्रमों में के सी त्यागी का परिचय जनता दल यू के महासचिव के साथ-साथ स्वतंत्र राजनीतिक टीकाकार के तौर पर करवाया। यह स्वाग्तयोग्य बदलाव है। अगर यह इरादतन नहीं था, तब भी इसका स्वागत किया जाना चाहिए।
अपनी फेसबुक वॉल में मनोज कुमार

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