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नायक और खलनायक

हिंदी फिल्मों के गानों में ‘दिल’ शब्द न जाने कितनी बार धड़का होगा। लगभग सारी ही हिंदी फिल्में दिल यानी कि नायक-नायिका के प्यार के बारे में होती हैं, तो यह स्वाभाविक भी है। आजकल फिल्मों जितना ही लोकप्रिय दिल का दूसरा मामला यानी सेहत का है और तमाम लोग दिल को सेहतमंद और मजबूत बनाने की फिराक में रहते हैं। अच्छा कोलेस्ट्रॉल और बुरा कोलेस्ट्रॉल की चर्चा वैसे ही होती है, जैसे किसी फिल्मी नायक और खलनायक की होती है। जैसे फिल्मों में अच्छा नायक होता है और बुरा खलनायक होता है, वैसे ही यह माना जाता है कि एक अच्छा कोलेस्ट्रॉल होता है और दूसरा बुरा खलनायक कोलेस्ट्रॉल। अच्छा कोलेस्ट्रॉल दिल की रक्षा करता है और बुरा कोलेस्ट्रॉल उसे नुकसान पहुंचाने पर आमादा रहता है। एक ताजा शोध यह बताता है कि कभी-कभी अच्छा कोलेस्ट्रॉल भी खून की धमनियों को संकरा बनाने का काम कर सकता है। जिसे हम अच्छा कोलेस्ट्रॉल कहते हैं, उसे वैज्ञानिक भाषा में हाई डेन्सिटी लाइपोप्रोटीन (एचडीएल) कहा जाता है और जिसे हम बुरा कोलेस्ट्रॉल कहते हैं, वह लो डेन्सिटी लाइपोप्रोटीन (एलडीएल) कहते हैं। लाइपोप्रोटीन नाम से स्पष्ट होता है कि यह फैट और प्रोटीन से मिलकर बनता है। एचडीएल और एलडीएल में कोलेस्ट्रॉल एक जैसा ही होता है, सिर्फ मात्रा का फर्क होता है, यानी नायक और खलनायक भाई-भाई ही होते हैं।

कोलेस्ट्रॉल अपने आप में खलनायक नहीं होता, शरीर की संरचना और कामकाज में वह बहुत महत्वपूर्ण होता है। या कि यह मान लें कि उसके बिना न शरीर बन सकता है, और न कामकाज कर सकता है। आम धारणा यह है कि एलडीएल की प्रकृति खून को ले जाने वाली धमनियों की दीवारों पर चिपकने की होती है। इससे इसकी धमनियां संकरी हो जाती हैं और एक वक्त के बाद उनसे खून का बहना बंद हो जाता है। अब एक अमेरिकी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने बताया है कि अच्छा कोलेस्ट्रॉल यानी एचडीएल भी कभी-कभी धमनियों की दीवारों में बुरे कोलेस्ट्रॉल जैसी हरकतें करने लगता है। ऐसा कोलेस्ट्रॉल धमनियों की दीवारों से छनकर खून में आ जाता है और वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर यह खलनायक बना हुआ नायक दिल की बीमारियों की चेतावनी देता है, तो इसकी जांच से दिल की बीमारियों का पता लगाना आसान हो सकता है।

कुछ वैज्ञानिक सवाल उठाते हैं कि जब कोलेस्ट्रॉल शरीर के लिए इतना जरूरी है, तो फिर वह खलनायक क्यों हो जाता है? उनका कहना है कि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि भोजन में फैट घटाने से दिल की बीमारियों का खतरा कम हो जाता है। उनका कहना है कि कोलेस्ट्रॉल तो खून में हमेशा ही मौजूद रहता है, फिर ऐसा क्यों होता है कि वह कभी खलनायक बन जाए? उनका कहना है कि समस्या कोलेस्ट्रॉल की नहीं, धमनियों की है, जिनकी दीवारें अस्वस्थ हो जाती हैं और उनमें कोलेस्ट्रॉल जमने लगता है। यानी दोषी नायक-खलनायक नहीं, बल्कि समाज की परिस्थितियां हैं। ऊंचे कोलेस्ट्रॉल का अचानक धमनियों की दीवारों पर खलनायक हो जाना भी यही बताता है कि सिर्फ फैट घटाना सेहत का अचूक नुस्खा नहीं है। धमनियों की दीवारों के स्वस्थ रहने के लिए संतुलित आहार और व्यायाम जरूरी है। संतुलित आहार में कुछ फैट भी जरूरी है, क्योंकि वह कई विटामिनों का भंडार है और कुछ वैज्ञानिकों के मुताबिक, कोलेस्ट्रॉल एंटी ऑक्सिडेंट भी होता है। इसलिए नायक-खलनायक के झगड़े में पड़े बिना अगर एक संतुलित और व्यापक नजरिये से सेहत को देखेंगे, तो कोलेस्ट्रॉल नुकसान नहीं, फायदा करेगा।

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