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रहमतों की बारिश है दूसरी पारी: युवराज सिंह

जीवन और मौत के बीच जब फासला कम हो रहा हो तो जीवन को जीने और समझने का नजरिया बदल जाता है। क्रिकेटर युवराज सिंह ने अपने हौसलों से न सिर्फ कैंसर से अपनी जंग में जीत हासिल की, बल्कि मैदान में वापसी भी करके दिखायी। अपनी बीमारी को छुपाकर रखने वाले अन्य सेलिब्रिटीज से इतर युवराज ने अपनी किताब ‘द टेस्ट ऑफ माई लाइफ: फ्रॉम क्रिकेट टू कैंसर एंड बैक’ में अपने जीवन को खुलकर शेयर किया। जीवन पर जीत की ओर अपनी इस वापसी पर आइये जानें युवराज सिंह के विचार..

क्रिकेट वर्ल्ड कप में मैन ऑफ द टूर्नामेंट जीतने के बाद वर्ष 2011 में एक ओर जहां युवराज क्रिकेट में अपने अच्छे दौर की पारी खेल रहे थे, वहीं इस बात से अनजान भीतर ही भीतर उनका शरीर कैंसर से जूझ रहा था। अपनी किताब में वे लिखते हैं, ‘एक खिलाड़ी के तौर पर हमें दर्द सहना सिखाया जाता है। हम शरीर का प्रशिक्षण और पोषण इस तरह करते हैं कि दिमाग तन की चिंता से मुक्त रह सके।’ मेडियास्टिनल सेमिनोमा के लिए कीमोथेरेपी करा रहे युवराज ने उपचार के दिनों में यह फैसला किया कि वे कीमो के दौरान अपने शरीर की प्रतिक्रिया को नियमित ट्विटर पर शेयर करेंगे। इसके लिए वे वीडियो डायरी भी बनाने लगे। बाल उड़ने, खाना न पचने संबंधी तमाम बातों और दवा के असर को लोगों से शेयर किया। यूवीकेन ट्रस्ट के जरिए वे कैंसर पीड़ितों के लिए भी काम कर रहे हैं। ‘कैंसर डे’ से एक दिन पहले जानते हैं कि आज युवराज क्या सोचते हैं, आइये जानें..

बदल गयी जीवन की परिभाषा
मेरे लिए यह एक पुनर्जन्म है। एक बार फिर से मैं जी रहा हूं, अपने दोस्तों व परिवार के साथ हूं। यही मेरे लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है। मैं अब पहले से अधिक शांत रहता हूं। जीवन का मूल्य समझता हूं। जीवन की  छोटी-छोटी बातें जैसे सांस लेना, तल्लीनता से खाना खाना, जिन पर मैं कभी ध्यान ही नहीं देता था, अब मेरे लिए अमूल्य बन गयी हैं। कीमो के दौरान जब शरीर में दर्द होता था, सांस लेने में परेशानी होती थी, खाना पचता नहीं था, तन और मन दोनों पर दबाव था, तब पता चला, सामान्य जीवन जीना कितना बड़ा आशीर्वाद है। अब मैं उन चीजों पर सोचकर अपना सुकून नहीं खोता, जो मेरे नियंत्रण में नहीं हैं।

अब भविष्य के बारे में नहीं सोचता
मैं कितना खेल पाऊंगा, कितने रन बनाऊंगा, यदि असफल हो गया तो क्या करूंगा आदि की चिंता नहीं करता। बावजूद, मैं पहले से अधिक अभ्यास करता हूं। मैं अब ऑर्गेनिक फूड और घर का खाना खाता हूं। फिलहाल मैं किसी खास कार्य में व्यस्त नहीं हूं। पांच से छह घंटे की ट्रेनिंग नियमित रूप से करता हूं। इसमें कोई कोताही नहीं। इसके अलावा जी भर के फिल्में देखता रहता हूं। 

मेरे अपने और क्रिकेट में वापसी
इस बीमारी में मैंने वास्तव में जाना कि मेरे अपने कौन हैं। कुछ ऐसे भी लोग हर दम साथ खड़े दिखायी दिए, जिनसे मैं कट गया था। मैंने नहीं सोचा था कि मैं दोबारा खेलूंगा। मैं सिर्फ ठीक होने की सोच रहा था।

किताब क्यों लिखी
कैंसर के उपचार के दौरान मुझे लांस आर्मस्ट्रॉन्ग से काफी प्रेरणा मिलती थी। उन्हें भी वही कैंसर था, जो मुझे था। लगा कि मेरी किताब भी दूसरे लोगों के लिए प्रेरक हो सकती है। शुरुआत में दूसरे सेलिब्रिटी की तरह मैं भी लोगों के सामने नहीं आना चाहता था, पर जब स्थिति को स्वीकार कर लिया, तब लगा कि मुझे ऐसा करना चाहिए, जो अन्य लोगों को अपनी लड़ाई लड़ने में मदद करे।
(‘ब्रंच’ से)

‘वो क्षण मेरी हिम्मत का इम्तिहान था’
उनके अगले चार शब्द थे: ‘कैंसर हो सकता है।’ मेरी हिम्मत को चुनौती देते हुए वे शब्द। बरसात धीमी हो चुकी थी। क्या इस बारिश की बूंदों को मैं अपने शरीर पर महसूस कर सकूंगा? मैं उम्मीद कर रहा था कि उन्होंने यह बात मां को नहीं बताई होगी। यह मेरा काम था, मुझे उन्हें बताने का तरीका सोचना था।

..मैं बच्चों की तरह रोया। इसलिए नहीं कि मुझे कैंसर का डर था, बल्कि इसलिए कि मैं नहीं चाहता था कि वह मेरे पास भी आए। मैं सामान्य जीवन चाहता था, जो अब कठिन लग रहा था।

..कीमोथेरेपी की शुरुआत से पहले, मुझे एक फॉर्म साइन करना था, जिस पर लिखा था कि मैंने सभी शर्तें और आगे होने वाले असर को समझ लिया है। नर्स जैकी ब्रेम्स फॉर्म पढ़कर सुना रही थीं, दवाओं का असर प्रजनन क्षमता पर भी पड़ सकता है। उनसे लीवर भी डैमेज हो सकता है। किडनी भी खराब हो सकती है। पेपर पर सिर्फ डैमेज, डैमेज, डैमेज पढ़ने को आ रहा था। आधा पढ़ने के बाद  जैकी बोली, ‘मैं और नहीं पढ़ सकती। तुम बस इस पर साइन कर दो।’ मैंने कहा, ‘जैकी, तुम मुझमें आत्मविश्वास भर रही हो या नहीं ?’ वह हंसी। उसका चेहरा चमक रहा था। मैंने उससे कहा, ‘तुम जब भी मुझसे मिलो, यही मुस्कान लिए मिलना। मैं तुम्हारे चेहरे पर चिंता नहीं देखना चाहता।’


..मुझे पहली बार तो यकीन नहीं हुआ था। वे विद्यार्थी थे, शायद मुझसे बहुत छोटे और वह हाथों में फूल, उपहार, कार्डस लिए खड़े थे। उनमें से कई बिरयानी, राजमा, आलू-गोभी, चिकन करी, दाल से भरे हुए डिब्बे भी लाए थे। उन्हें जरूर महसूस हुआ होगा कि मुझे भारत की याद सता रही है, और भारतीय व्यंजन मुझे खुशी दे सकेंगे। शुरुआती झिझक के बाद उन सबने आपस में बातें करनी शुरू कीं। अचानक मुझे एक पल को महसूस हुआ कि मैं जयपुर या राजकोट के क्रिकेट स्टेडियम में खड़ा हूं। लंबे समय बाद कुछ जाने-पहचाने से चेहरे देखकर मैं खुश था।
( ‘द टेस्ट ऑफ माई लाइफ: फ्रॉम क्रिकेट टू कैंसर एंड बैक’ का एक अंश)

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