DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

हौसलों में हो दम तो कामयाबी नहीं मुश्किल

गूंगा पहलवान से मशहूर विरेंदर सिंह ने अपने जोश व लगन से दुनियाभर में नाम कमाया है। कई अन्य रिकॉर्डस के साथ 2013 के डीफलंपिक्स का गोल्ड मेडल इन्हीं के नाम रहा..

जोश, जज्बा और कुछ कर गुजरने की तमन्ना हो तो बड़ी से बड़ी शारीरिक अक्षमता भी सफलता के रास्ते में रोड़ा नहीं बन सकती। कुछ ऐसी ही कहानी है पहलवान विरेंदर सिंह की। हरियाणा के झज्जर जिले के सासरोली गांव के रहने वाले विरेंदर ने अपनी काबिलियत और कुश्ती के दम पर दुनियाभर में लोहा मनवाया है।

एक घटना ने बदल दी जिंदगी
विरेंदर को देश-दुनिया में लोग गूंगा पहलवान के नाम से ही पहचानते हैं। विरेंदर बचपन से ही सुन और बोल नहीं सकते थे। लोग उन्हें प्यार से ‘गूंगा’ बुलाते थे और यही उनकी पहचान बन गया। जिंदगी में बदलाव के लिए सिर्फ एक निर्णय ही काफी होता है। यह बात गूंगा पहलवान पर बिल्कुल सटीक बैठती है। बचपन में उन्हें पैरों में एक समस्या थी, जिसके इलाज के लिए पिता ने उन्हें दिल्ली भेज दिया। इस दौरान वह काफी समय दिल्ली में रहे। इस बीच वह छत्रसाल अखाड़ा जाने लगे। कोच की देखरेख में ही गूंगा पहलवान ने दसवीं तक की पढ़ाई की और कुश्ती के गढ़ माने जाने वाले छत्रसाल अखाड़े में ही प्रैक्टिस शुरू कर दी। वहां से वह सफलता की सीढ़ियां चढ़ते चले गए। हालांकि शुरुआत में विरेंदर के घरवाले उनके अखाड़ा जाने के खिलाफ थे। उनके पिता भी एक पहलवान थे और उन्हें इस खेल में ज्यादा कुछ नहीं मिला, पर विरेंदर के जोश को देखते हुए घरवालों ने उन्हें इसकी अनुमति दे दी। 

रिकॉर्डों के बेताज बादशाह
2002 में विरेंदर ने दंगल लड़ना शुरू किया और तब से वे आगे ही बढ़ते गए। गूंगा पहलवान के नाम एक नहीं, बल्कि कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खिताब हैं। 2013 में बुल्गारिया डीफलंपिक्स में उन्होंने 12-4 से मुकाबले को एकतरफा करते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिया। इतना ही नहीं, वर्ष 2005 में मेलबर्न में हुए डीफलंपिक्स में भारत का पहला और डीफलंपिक्स का एकमात्र गोल्ड मेडल भी अपने नाम किया था। इसके अलावा 2009 ताइपेई डीफलंपिक्स में ब्रॉन्ज मेडल, 2008 वल्र्ड डीफ रेसलिंग में सिल्वर मेडल और 2012 वल्र्ड डीफ रेसलिंग चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल जीत चुके हैं। दिल्ली में वर्ष 2009 में उन्हें ‘नौ सेरवें’ का खिताब भी मिल चुका है। यह खिताब उन पहलवानों को मिलता है, जो लगातार नौ रविवार तक सभी दंगल जीतते हैं।

बड़े-बड़े दिग्गज हैं कायल
भले ही गूंगा पहलवान बोल और सुन नहीं सकते, लेकिन अपनी काबिलियत और दांव-पेच के दम पर अच्छे-अच्छे  पहलवानों को चित कर चुके हैं। वर्ष 2012 के लंदन ओलंपिक में रजत पदक विजेता सुशील कुमार भी उनकी काबिलियत और मिलनसार व्यवहार के मुरीद हैं। विरेंदर ने छत्रसाल में ही प्रैक्टिस करने वाले सुशील के ओलंपिक अभियान में काफी मदद की थी। कुश्ती के महारथी गुरु सतपाल और विरेंदर के कोच रामफल मान भी उनके प्रशंसक हैं। रामफल का कहना है कि विरेंदर बहुत अनुशासित पहलवान हैं। वह कामयाबी पाने के लिए कड़ी मेहनत करने में कसर नहीं छोड़ते। 

कठिनाइयों को नहीं होने दिया हावी
विरेंदर के गांव में गूंगे, बहरे लोगों का कोई भविष्य नहीं था, पर उन्होंने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। शुरुआत में प्रैक्टिस के दौरान कोच को उन्हें समझाने में मुश्किलें होती थीं, लेकिन बहुत जल्द विरेंदर उन चीजों को समझने लगे और आज बाकी पहलवानों को भी कुश्ती के गुर सिखाते हैं। आर्थिक तंगी को उन्होंने कभी भी अपने सपनों पर हावी नहीं होने दिया। विरेंदर के संघर्ष और कामयाबियों पर ‘गूंगा पहलवान’ के नाम से डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बन चुकी है। हालांकि अभी भी कई चुनौतियां हैं। उनकी पहली चुनौती 2016 में ब्राजील के रियो में होने वाले ओलंपिक में जाने के लिए आर्थिक मदद की है। हालांकि वे इसके लिए जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं।

प्रस्तुति: परिणय कुमार

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:हौसलों में हो दम तो कामयाबी नहीं मुश्किल