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मुजफ्फरनगर दंगाः सियासत में उलझी पीड़ितों की व्यथा

मुजफ्फरनगर दंगाः सियासत में उलझी पीड़ितों की व्यथा

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में दंगों पर राजनीतिक दलों की सियासत के बीच दंगा पीड़ितों से संबंधित शिकायतें विभागीय एवं प्रक्रियागत जटिलताओं में उलझ कर रह गई दिखती हैं जहां केंद्र एवं राज्य स्तर पर कहीं से कोई ठोस जवाब सामने नहीं आ रहा है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार परिषद की ओर से दायर शिकायत पर कार्रवाई महज निर्देश देने और रिपोर्ट तलब करने तक ही सीमित रही। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग में मुजफ्फरनगर दंगे के सिलसिले में चार दिसंबर 2013 तक आठ शिकायतें प्राप्त हुईं और सभी शिकायतें प्रक्रियाधीन हैं।

सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत आयोग से प्राप्त जानकारी में बताया गया है कि आयोग की शिकायतों पर विचार किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग ने कहा कि समाचार पत्रों के माध्यम से आयोग के संज्ञान में यह बात आयी है कि सितंबर 2013 में मुजफ्फरनगर जनपद के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में साम्प्रदायिक दंगों की घटनाएं हुई थीं। इस घटना में जानमाल की भारी हानि हुई और हजारों की संख्या में लोग शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर हुए।

आरटीआई से प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग की कार्रवाई तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगने तक ही सीमित रही। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष ने मुजफ्फरनगर दंगों के बारे गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री के रहमान खान, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आदि को पत्र लिखकर इस विषय को उठाया।

मुजफ्फरनगर दंगों के बारे में राष्ट्रपति कार्यालय को प्राप्त शिकायतों, ज्ञापनों और कार्यवाही की जानकारी एवं ब्यौरा देने के सवाल पर राष्ट्रपति सचिवालय ने कहा कि सचिवालय में प्रतिवेदनों का रिकॉर्ड विषयवार नहीं रखा जाता है। रिकॉर्ड में भाजपा से एक प्रतिवेदन दर्ज है। राष्ट्रपति कार्यालय ने बताया कि उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार मुजफ्फरनगर दंगों से संबंधित भाजपा की उमा भारती और अशोक प्रधान का एक संयुक्त प्रतिवेदन 27 सितंबर 2013 को प्राप्त हुआ जिसे विशेष कार्य अधिकारी, प्रधानमंत्री कार्यालय को अग्रेषित कर दिया गया है।

आरटीआई के तहत जानकारी के अनुसार, मुजफ्फरनगर दंगा प्रभावित क्षेत्र के संबंध में राज्यपाल सचिवालय द्वारा न ही कोई जांच दल भेजा गया और न ही कोई रिपोर्ट भेजी गई है। जांच दल के दौरे के लिए सचिवालय स्तर पर कोई धनराशि भी व्यय नहीं हुई। श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने कहा कि मंत्रालय के बाल श्रम विभाग को मुजफ्फरनगर दंगों के सिलसिले में कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई है।

अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने बताया कि इस मंत्रालय के मंत्री रहमान खान के साथ पांच सदस्यीय दल 24 सितंबर 2013 को प्रभावित क्षेत्र गया था। हालांकि मंत्रालय ने प्रभावित क्षेत्रों के ब्यौरे की जांच के लिए कोई टीम नहीं भेजी। वक्फ अनुभाग को भी इस संबंध में कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई है।

बहरहाल, उत्तर प्रदेश सरकार के विशेष जांच दल (एसआईटी) ने मुजफ्फरनगर और आस-पास के इलाकों में सितंबर दंगों के सिलसिले में कम से कम 225 लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दायर किया है। मुरादाबाद स्थित आरटीआई कार्यकर्ता सलीम बेग ने सरकार एवं विभागों से दंगों के बारे में जानकारी मांगी थी।

मुजफ्फरनगर दंगों के मद्देनजर यहां और इससे लगे क्षेत्रों में 50 हजार से अधिक लोगों के बेघर होने की खबरें आईं। इन्हें 38 शरणार्थी शिविरों में रखा गया। इन शिविरों में कुव्यवस्था एवं सुविधाओं के अभाव की खबरें सुर्खियों में हैं, हालांकि दंगों पर सियासत जारी है।

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