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पेट के लिए माडाकर्मी सूदखोरों की शरण में

धनबाद/ केके सुनील। कोयलांचल की 12 लाख आबादी को नागरिक सुविधाएं देने वाला सौ साल पुराना माडा (खनिज क्षेत्र विकास प्राधिकार) राज्य सरकार के जंजाल में फंस कर कराह रहा है। माडा के पास आय के स्रेत के नाम पर सिर्फ जलकर (वाटर टैक्स) रह गया है। इससे माडा कर्मचारियों को वेतन नहीं मिल पा रहा है।

कर्मचारियों का 22 से 24 महीने का वेतन बकाया चल रहा है। संस्था में कार्यरत 16 सौ कर्मचारियों को घरों में चूल्हा जलाना मुश्किल हो गया है। हालत यह है कि प्रतिमाह अखबारों में कर्मचारियों की भुखमरी, इलाज के अभाव में दम तोड़ने तथा आत्महत्या की खबरें प्रमुखता से छप रही हैं। वेतन की स्थिति क्या है, न तो अधिकारी जवाब दे पाते हैं और नहीं कर्मचारी। स्थिति यह है कि कई वर्षो से बैंक ने भी माडा कर्मचारियों को ऋण देना बंद कर दिया है।

मरता क्या नहीं करता, आर्थिक विपणनता के कारण अब वे सूदखोरों के चंगुल में फंसते जा रहे हैं। हालत यह है कि कई कर्मचारियों का बैंक पासबुक और चेक सूदखोरों के पास है। जब भी प्रबंधन से बैंक में वेतन का पैसा डाला जाता है, सूदखोर खाता से पैसा निकाल लेते हैं और वेतन के नाम पर कर्मचारियों के हाथ पर सूदखोर दो-चार सौ रुपए रख देते हैं। परिणाम निकलता है कि तपन मांझी जैसे कर्मचारी आर्थिक तंगी में आकर अत्महत्या को मजबूर हो जाते हैं।

तपन मांझी तो एक उदाहरण है, कई ऐसे कर्मचारी हैं, जो सूदखोरों के चंगुल में फंस कर कराह रहे हैं। 60 प्रतिशत कर्मचारी सूदखोरों के फेर में माडा कर्मचारी नेता लक्ष्मण सिंह व डीएन दुबे के अनुसार आर्थिक तंगी की सर्वाधिक मार चतुर्थवर्गीय कर्मचारी ही ङोल रहे हैं। वेतनमान कम होने ( माडा में छठा वेतनमान लागू नहीं है) से इस संवर्ग के अधिकतर कर्मचारी आर्थिक तंगी ङोल रहे हैं। पढ़े-लिखे कम होने के कारण सूदखोर भी इसका फायदा उठाते हैं।

एक बार इनके चंगुल में फंस जाने के बाद वे निकल नहीं पाते। कई अधिकार माडा से ले लिए गएकभी इस संस्था के पास आमदनी का जरिया कोयला से प्राप्त रॉयल्टी, मुद्रांक शुल्क, बाजार शुल्क, भूमि कर आदि हुआ करता था। एक-एक कर सारे अधिकार माडा से ले लिए गए। राज्य सरकार की लापरवाही के कारण कुछ अधिकार उलझ गए हैं। कर्मचारियों के सामने विकल्प नहीं कर्मचारी नेता डीएन दुबे का कहना है कि रही सही कसर झारखंड नगरपालिका संशोधन अधिनियम ने पूरा कर दिया।

अधिनियम के तहत नौ फरवरी, 2012 को माडा को विधवित नगर निगम में विलय की अधिसूचना जारी की गई। लेकिन, इसके बाद भी माडाकर्मियों को न्याय नहीं मिला। न्याय की गुहार में कर्मचारी 23 महीने गुजार दिए। हड़ताल पर हड़ताल कर राज्य सरकार व प्रशासन को जगाया, लेकिन कर्मचारियों को आज भी न्याय नहीं मिला है। परिणाम निकल रहा है कि माडाकर्मियों के सामने विकल्पहीनता की स्थिति है।

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