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विचार ही नहीं, अब अवसरों की भूमि भी है भारत

‘ब्रेन ड्रेन’ को रोकने और होनहार भारतीयों को विदेश से वापस लाने की इंदिरा गांधी की योजना की एक बड़ी उपलब्धि रघुनाथ अनंत माशेलकर रहे। 1976 में 33 साल की उम्र में वह भारत लौटे और नेशनल केमिकल लैबोरेटरी से जुड़ गए, बिना यह जाने कि पगार क्या है? जुलाई 1995 में वह भारत के शीर्ष संस्थान सीएसआईआर के महानिदेशक बने। इस बार भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण देने की घोषणा की। उनसे प्रवीण प्रभाकर ने बातचीत की:

पद्म विभूषण के साथ अपने मौजूदा व्यक्तित्व का कैसे आकलन करते हैं?
सुनने में अच्छा लग रहा है कि ‘विज्ञान और सम्मान’ या ‘साइंस और सम्मान।’ मैं देख रहा था कि बहुत कम भारतीयों को यह सम्मान मिला है। विज्ञान के क्षेत्र में और भी कम नाम हैं। इसलिए मेरे लिए बड़ी बात है। सम्मान यदि स्पॉन्सर्ड हो, तो मैं कहूंगा- मोको कहां सीकरी सो काम! लेकिन जब देश कहता है कि बहुत अच्छा काम किया है, तो अपने पर फा होता है। वैज्ञानिक तो सातों दिन, चौबीसों घंटे काम करते हैं। गीता  का सार है- काम करो, फल की आशा न करना। हम इसे मानते हैं। लेकिन मैं यह मानता हूं कि सम्मान मिलने का अर्थ यह नहीं कि काम खत्म हो गया या मैं शिखर पर पहुंच गया हूं। मतलब यह है कि दोगुने जोश के साथ काम करना है। मुझे याद है 27 दिसंबर, 2006 का प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का भाषण, जो उन्होंने सीएसआईआर के शांति स्वरूप भटनागर सम्मान के मौके पर दिया था। मैं संस्थान के महानिदेशक पद से रिटायर हो रहा था। उन्होंने कहा था कि माशेलकर अन्य लोगों के लिए प्रेरणा-पुंज हैं, मगर उनका सर्वोत्तम काम आना बाकी है। 

किसी संस्थान को आपने प्रभावित किया हो और किसी से प्रभावित हुए हों?
एक ही जवाब है- सीएसआईआर। 1995 में मैं जब इसका डीजी बना था, तब किसी ने मुझसे पूछा कि इस संस्थान के बारे में आपका विजन क्या है? मैंने कहा, सीएसआईआर इंक। उसने फिर पूछा और अपने बारे में, तो मैंने कहा, ‘सीईओ ऑफ सीएसआईआर इंक।’ ये दो बातें सभी के जवाब हैं। इस संस्थान की 40 प्रयोगशालाएं थीं और 20,000 लोग थे। तब मैंने देखा कि ये प्रयोगशालाएं अलग-अलग इकाई के तौर पर हैं, बिना किसी समान लक्ष्य या दृष्टि के। हम जो शोध करते थे, उनका लाभ अपने उद्योगों और समाज को मिलना चाहिए था, वह नहीं मिलता था। मैंने उसे एक लक्ष्य केंद्रित और उत्पादक संस्थान बनाने का प्रयास किया। मेरे प्रयास सफल हुए। जयंत नार्लिकर ने एक किताब लिखी है- साइंटिफिक एज।  20वीं शताब्दी में जो दस सबसे बड़े काम हुए हैं, उनमें दसवें काम के रूप में उन्होंने सीएसआईआर का जिक्र किया है। इस बदलाव का कारण था कि सीएसआईआर कुटुंब में सामथ्र्य तो था, पर काम नहीं हो पा रहा था। मैंने जागृत किया। हमने कहा कि ये प्रयोगशालाएं एक हैं। इस फिलॉसफी से काफी कुछ बदला, मुझमें भी बदलाव आए। बजरंग बली को भी उनकी ताकत का एहसास कराना पड़ता है, तभी वह सूरज की ओर बढ़ते हैं।

लेकिन भारत से प्रतिभाओं का पलायन थमा नहीं है।
एक घटना सुनिए। मैं नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन का चेयरमैन हूं। कोई इंटरव्यू चल रहा था। एक कैंडिडेट आया, उसकी सीवी में मैंने देखा कि वह ब्रांडिंग करने में अच्छा है। मैंने उससे कहा, ‘भाई मेरे, भारत की ब्रांडिंग करो।’ वह सकपका गया। उसने कहा कि ‘मैंने कार और कपड़े की ब्रांडिंग की है, पर देश की कैसे करूं?’ तब मैंने उसे उदाहरण देकर कहा कि ‘अमेरिका अपने को ‘लैंड ऑफ ऑपच्यरुनिटी’ कहता है और अब सोचकर बोलो।’ उसने कहा- भारत ‘लैंड ऑफ आडियाज’ है। देखिए, विरोधाभास! इसीलिए, तो जहां अवसर है, ‘आडियाज’ जाते हैं। तभी तो ‘ब्रेन ड्रेन’ की घटनाएं होती हैं। अगर इस रुख को बदलना है, तो भारत को ‘लैंड ऑफ ऑपच्यरूनिटी’ बनाना होगा, जो अब बन भी रहा है। कुछ साल आर्थिक तरक्की के रहे हैं। निवेश बढ़ा है, रिसर्च व इनोवेशन में नए काम हो रहे हैं। शिक्षा तंत्र का विस्तार हो रहा है। 30 नए केंद्रीय विश्वविद्यालय खुल रहे हैं, वगैरह-वगैरह। मेरी प्रयोगशाला के करीब इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस ऐंड एजुकेशन रिसर्च है, जहां मैं देखता हूं कि विदेशों से हमारे वैज्ञानिक लौट रहे हैं। विदेशी लोग भी आ रहे हैं।

पर पूंजी के बिना प्रतिभाओं के कुंद हो जाने के भी कई उदाहरण हैं।

‘क्रिएशन ऑफ वेल्थ टु नॉलेज’ में पश्चिमीदेश बहुत आगे हैं। यहां ‘सरस्वती’ और ‘लक्ष्मी’ का मिलन नहीं होता। ज्ञान यहां पैदा करते हैं, फायदा विदेश को मिलता है। इसलिए मैंने पेटेंट को जोड़ा है। यह हमारे नए ज्ञान को सुरक्षित करता है।

पेटेंट प्रकरण आपके लिए मुश्किल भरा रहा।
लंबी राहों में मुश्किलें हजार आती हैं, पर रुकना नहीं चाहिए। विवाद यह था कि टेक्निकल एक्सपर्ट ग्रुप की जो रिपोर्ट है, क्या वह ट्रेड रिलेटेड आस्पेक्ट्स ऑफ इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स की अवहेलना तो नहीं है? बाद में हमने इस शंका को दूर किया। लेकिन इसे यह रूप दे दिया गया कि इससे पूरे भारत के कारोबार पर असर पड़ेगा। वैसे इस विवाद से कोई फर्क नहीं पड़ा। पूरी रिपोर्ट उसी तरह मान ली गई।

किसके नेतृत्व से आप बहुत प्रभावित हुए?
प्रोफेसर सीएनआर राव से। 80 साल के हैं, फिर भी सुबह पांच बजे लैब जाते हैं। मुझे फेलोशिप ऑफ रॉयल सोसाइटी मिली थी, नोबेल सम्मान के बाद यह सबसे बड़ा सम्मान है। मैंने उनको बताया। उन्होंने कहा, नॉट बैड। मुझे यूएस नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस का फॉरेन एसोशिएट चुना गया, मैं पहला भारतीय साइंटिस्ट था। पता है, उन्होंने क्या कहा? नॉट बैड। मैंने उनसे पूछा कि आपको प्रभावित करने के लिए मुझे क्या करना होगा? उनका जवाब था कि ऐक्सिलेंसी की जो सीढ़ी आप चढ़ रहे हैं, उसकी कोई लिमिट नहीं है, आप खुद पर कोई लिमिट नहीं बनाएं।

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