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साहित्य का बनाना रिपब्लिक

न चंद बरदाई ने मनाया। न तुलसी ने मनाया। न मीरा ने मनाया। न सूर ने मनाया। न जायसी ने मनाया। न कबीर ने मनाया। न रैदास ने मनाया। न दादू ने मनाया। न बिहारी ने मनाया। न केशव ने मनाया। न देव ने मनाया। न पद्माकर ने मनाया। न रहीम ने मनाया। न रसखान ने मनाया। न घनांनद ने मनाया। न गंग ने मनाया। न भारतेंदु ने मनाया। न प्रताप नारायण मिश्र ने मनाया। न बालमुकुंद गुप्त ने मनाया। न शिवप्रसाद सितारेहिंद ने मनाया। न महावीर प्रसाद द्विवेदी ने मनाया। न मैथिलीशरण गुप्त ने मनाया। न सियाराम शरण गुप्त ने मनाया। न सुकुल जी ने मनाया। न प्रेमचंद ने मनाया। न ‘विमल बीए पास’ बाबू श्यामसुंदर दास ने मनाया। न प्रसाद ने मनाया। न पंत ने मनाया। न निराला ने मनाया। न महादेवी ने मनाया। न पाणिनि ने मनाया। न भरत ने मनाया। न दंडी ने मनाया। न भामह ने मनाया। न रुदट्र ने मनाया। न भट्ट लोल्लट ने मनाया। न अभिनव गुप्त ने मनाया। न आनंद वर्धन ने मनाया। न मम्मट ने मनाया। न विश्वनाथ ने मनाया। न पंडितराज जगन्नाथ ने मनाया। न कुंतक ने मनाया। न वामन ने मनाया। न कालिदास ने मनाया। न भवभूति  ने मनाया। न भारवि ने मनाया। न अश्वघोष ने मनाया।
सोचा। विचारा। पढ़ा और लिखा। लेकिन अपने किए-धरे का धरती पर एहसान जताए बिना विनयपूर्वक ‘ज्यों की त्यों धरि दीनी चदरिया’ की मानिंद चले गए। इतने बड़े नाम। इतने बड़े काम। लेकिन न अपना जन्मदिन लिखा और न अपने लिखे का हिसाब लिखा। खुद को कर्ता न कहा। कर्म किया और चले गए।
लाई हयात, आई कजा, ले चली चले
अपनी खुशी से आए न अपनी खुशी चले (गालिब)
किसी के जन्म का ठीक-ठाक न पता। न पूरा नाम, न जन्मकुंडली, न ग्राम का नाम। सब कुछ किंवदंतियों और दूसरे-तीसरे उल्लेखों से पता चला कि ये भी हुए। वो भी हुए। अपने साहित्य-पुरखों में अपने किए के प्रति ऐसा विकट बेगानापन, अपने आप से ऐसी विरक्ति, ऐसी दूरी। अपने किए धरे से ऐसा विराग। और हमरे दिल्लीपति कुछ भैया लोग हैं कि न कुछ खास किया, न कुछ खास लिखा और अपना जन्मदिन मनाने को आए दिन मचलते रहते हैं। सत्तर के, पिचहत्तर के, अस्सी के, पिचासी के मनाते हैं जन्मदिन। बच्चों से स्पर्धा करते हैं भैया लोग। रचने वाले रच गए़, इनको छोड़ गए। अब हर रोज जन्मदिन है। न मने, तो नींद नहीं आती। मने, तो अगले की आराधना। अद्भुत साधना है। साल में डबल-डबल।एक बार असली तिथि को, तो दूसरी बार नकली स्कूली तिथि को। मनाने में भी कंपटीशन है। उसके जन्मदिन पर मंत्री आया, और हमारे में संतरी? क्या अपना पव्वा इतना हल्का है? यह ठीक नहीं हुआ, पप्पू रे। इस बार एक ठो मंत्री न लाया, तो गाली मार दूंगा। कितना आगे बढ़ आया है साहित्य? मनाते-मनाते वह विश्वस्तरीय हो चला है, और हिंदी में अंग्रेजी बोलता है- यू नो माई दिस बुक हैज बीन ट्रांस्लेटेड इन फ्रेंच, इन स्पेनिश, इन पोचरुगीज जी। दिस बुक हैज बीन प्रेस्काइब्ड इन प्राग यूनिवर्सिटी हिंदी सिलेबस जी। पार्टी ऑन दिस ऑकेजन जी। माई बुक रिलीज जी। हैव फन जी। अपनी कविता ट्रांसलेटी-घासलेटी। साहित्य के ‘बनाना रिपब्ल्कि’ के ‘मनानावादी’ हैं अपने भैया लोग। मनाना उनको आता है। मनाना उनको भाता है। मनाना उनने काता है। मनाना उनका छाता है।

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