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हरीश रावत की पहचान मजबूत राजनीतिज्ञ के रूप

हरीश रावत की पहचान मजबूत राजनीतिज्ञ के रूप

उत्तराखंड के कद्दावर नेताओं में शुमार हरीश रावत ऐसे राजनीतिज्ञ माने जाते हैं जो अपने प्रतिद्वंदियों से मात खाने के बाद हर बार और मजबूत होकर उभरे और केंद्र में कैबिनेट मंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद अंतत: प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गये।

पैंसठ वर्षीय रावत ने राज्य गठन के बाद से ही कांग्रेस के लिये मजबूत राजनीतिक जमीन तैयार कर उसे सरकार बनाने तक की स्थिति में पहुंचाया, लेकिन वर्ष 2002 और 2012 में हुए विधानसभा चुनावों के बाद उनकी दावेदारी को एनडी तिवारी और विजय बहुगुणा के मुकाबले खारिज कर दिया गया।

पार्टी सूत्रों का मानना है कि इस समय लोकसभा चुनावों से ऐन पहले पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को हटाकर उनके स्थान पर रावत को लाये जाने के पीछे भी कांग्रेस हाईकमान को उनसे उसी करिश्मे की उम्मीद है ।

सत्ताइस मार्च, 1949 में अल्मोड़ा जिले की भिकियासैंण तहसील में मोहनरी गांव में जन्मे रावत का शुरुआत से ही रुझान राजनीति की ओर रहा। अल्मोड़ा में भिकियासैंण और सल्ट तहसील का इलाका स्वतंत्रता संग्राम के दिनों से ही राजनीतिक गतिविधियों के लिये चर्चित रहा और ऐसे वातावरण में पले बढ़े रावत का राजनीति से लगाव होना स्वभाविक ही है।

लखनऊ विश्वविद्यालय से एलएलबी की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद रावत ने वकालत को अपने जीवन यापन का साधन बनाया लेकिन उन्होंने इसके साथ ही राजनीति का दामन भी थामे रखा । विद्यार्थी जीवन में ही उन्होंने भारतीय युवक कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की। वर्ष 1973 में कांग्रेस की जिला युवा इकाई के प्रमुख चुने जाने वाले वे सबसे कम उम्र के युवा थे।

वर्ष 1973 और 1980 के बीच की अवधि में रावत जिला युवक कांग्रेस से लेकर प्रदेश युवक कांग्रेस के महत्वपूर्ण पदों पर रहे । वर्ष 1980 में वह पहली बार अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर सांसद चुने गए। उसके बाद वर्ष 1984 व 1989 में भी उन्होंने संसद में इसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया ।

वर्ष 1992 में उन्होंने अखिल भारतीय कांग्रेस सेवा दल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का महत्वपूर्ण पद संभाला जिसकी जिम्मेदारी वह वर्ष 1997 तक संभालते रहे । राज्य निर्माण के पश्चात रावत प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बनाये गये और उनकी अगुवाई में 2002 के विधान सभा चुनावों में कांग्रेस को बहुमत प्राप्त हुआ और उत्तराखण्ड में कांग्रेस की सरकार बनी।

तिवारी के मुकाबले मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से बाहर होने के बाद उसी साल नवम्बर में रावत को उत्तराखण्ड से राज्य सभा के सदस्य के रूप में भेजा गया । पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान उन्होंने हरिद्वार संसदीय सीट से चुनाव लड़ा जहां से वह भारी मतों से जीते । उनके निकटस्थ प्रतिद्वंद्वी से जीत का अंतर एक लाख वोटों से भी ज्यादा रहा । पिछले काफी समय से भाजपा, सपा या बसपा की झोली में रही हरिद्वार सीट जीतने वाले रावत को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने मंत्रिमंडल में पहले राज्य मंत्री ओर बाद में कैबिनेट मंत्री का दायित्व दिया ।

हालांकि वर्ष 2012 में कांग्रेस के प्रदेश में एक बार फिर सत्ता में आने के बाद उनका नाम मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे चलता रहा लेकिन इस बार भी पार्टी हाईकमान ने उनकी दावेदारी को नकार दिया और उनकी जगह विजय बहुगुणा को तरजीह दी ।

बहुगुणा के सत्ता संभालने के बाद से लगातार प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें चलती रहीं जो पिछले साल जून में आयी प्राकृतिक आपदा से निपटने में राज्य सरकार की कथित नाकामी के आरोपों के चलते और तेज हो गयीं और आज उनकी परिणति रावत के मुख्यमंत्री बनने के रूप में हुई ।

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