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बिहार की धरती से निकला था ‘सरफरोशी की तमन्ना..’

‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ यह शेर आज भी हमारे दिलों में रचा-बसा है। जलसा, जुलूस और राष्ट्रीय पर्व के मौकों पर हम इसे गाते-गुनगुनाते हैं। आजादी की लडमई के वक्त यह इंकलाबियों का पसंदीदा तराना था। लेकिन आपको पता है, इसे किसने लिखा है? ज्यादातर लोग इसे क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की रचना मानते हैं। हालांकि तथ्य कुछ और कहते हैं। तथ्यों के मुताबिक इसे बिहार के बिस्मिल अजीमाबादी ने लिखा है।

गलतफहमी की वजह
रामप्रसाद बिस्मिल जितने बड़े देशभक्त थे, उतने ही माहिर शायर भी। ‘बिस्मिल’ उपनाम से शायरी भी करते थे। उस दौर में यह तराना हमेशा उनकी जुबान पर रहता था। 1927 में सूली पर चढ़ते वक्त भी यह शेर उनकी जुबान पर था। उनके इंकलाबी साथी जेल से पुलिस की लारी में जाते हुए, अदालत में मजिस्ट्रेट को चिढमते हुए और लौट कर जेल आते हुए कोरस के रूप में इस तराने को गाया करते थे। तबसे लोगों ने इसे उनके नाम से जोडम् दिया।

‘राम प्रसाद बिस्मिल ने अपने हमनाम बिस्मिल अजीमाबादी की गजल को फांसी के तख्ते से पढ़ा कर अमर कर दिया’
-मशहूर शायर अली असगर जाफरी
(उर्दू दुनिया में1998 में प्रकाशित)

क्या है हकीकत
सबूत एक :

यह गजल सैयद शाह मोहम्मद हसन बिस्मिल अजीमाबादी उर्फ झब्बू शाह की लिखी है। 1921 ई में उन्होंने इस गजल की रचना की, जब वे 20 वर्ष के थे। अपने उस्ताद शाद अजीमाबादी से इस पर उन्होंने सुधार भी करवाया। जिस कागज पर उन्होंने यह गजल लिखी, उसकी नकल पटना की खुदाबख्श लाइब्रेरी में शाद अजीमाबादी के सुधार के साथ है। मूल कॉपी आज भी पटना सिटी में रह रहे उनके खानदान के पास है।

सबूत दो :
‘बिस्मिल अजीमाबादी के साथ एक शाम’ नाम से एक रिकॉर्डिग (टेप नम्बर-80) आज भी खुदाबख्श लाइब्रेरी में है। इसमें लाइब्रेरी के पूर्व निदेशक आबिद रजा बेदार का बिस्मिल अजीमाबादी से लिया गया इंटरव्यू है। बातचीत में न केवल बिस्मिल अजीमाबादी ने अपनी गजल का खुलासा किया है, बल्कि उसे गाया भी है।

सबूत तीन :
बिस्मिल अजीमाबादी का गजल संग्रह ‘हिकायत-ए-हस्ती’ खुदाबख्श लाइब्रेरी में मौजूद है। उसमें 11 मिसरे की यह गजल छपी है। बिहार उर्दू अकादमी के आर्थिक सहयोग से इसका प्रथम संस्करण 1980 में छपा था।

सबूत चार :
बिहार टेक्स्ट बुक पब्लिशिंग कॉरपोरेशन द्वारा नौवीं कक्षा की उर्दू पाठय़पुस्तक ‘दरख्शां’ में बिस्मिल अजीमाबादी की जीवनी के साथ यह लिखा गया है कि इस गीत की रचना इन्होंने ही की थी।

सबूत पांच :
बिस्मिल अजीमाबादी के पोते सैयद शाह मनव्वर हसन द्वारा निकाली जा रही साप्ताहिक पत्रिका ‘नेदा-ए-बिस्मिल’ (15-21 अगस्त 2003) के अंक में डॉ. शांति जैन ने लिखा है कि 1921 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में काजी अब्दुल वदूद के साथ बिस्मिल अजीमाबादी भी गए थे, जहां उन्होंने अपनी यह गजल पढ़ी थी।

अंग्रेजों ने जब्त किया प्रकाशन
बिस्मिल अजीमाबादी की मंझली बेटी शमीमा खातून के बेटे डॉ. सैयद मसऊद हसन बताते हैं कि नानाजान की यह गजल आजादी की लडमई के वक्त काजी अब्दुल गफ्फार की पत्रिका ‘सबाह’ में 1922 में छपी, तो अंग्रेजी हुकूमत तिलमिला गई। एडिटर ने नाना को खत लिखा कि ब्रिटिश हुकूमत ने इस प्रकाशन को जब्त कर लिया है। गिरफ्तारी का वारंट भी जारी कर दिया गया है। मेरे पास वह खत तो नहीं है, लेकिन पुरखों से सुनता आया हूं।

बिस्मिल अजीमाबादी के बारे में
पूरा नाम: सैयद शाह मोहम्मद हसन बिस्मिल अजीमाबादी उर्फ झब्बू शाह।
जन्म: म्1901 ई में पटना से करीब 30 किलोमीटर दूर खुसरूपुर में।
शिक्षा: कम पढ़े-लिखे, लेकिन उर्दू-फारसी पर जबरदस्त पकड़ा
विरासत: हजरत मखदूम शाह फरीद तवेला बख्श से जुड़ता हुआ प्रसिद्ध सूफी निजामुद्दीन औलिया से जा मिलता है।
पिता: सैयद शाह आले हसन नामी बैरिस्टर थे।
नाना: अजीमाबाद (पटना) के मशहूर रईस शाह हबीबुर्रहमान मुबारक अजीमाबादी।

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