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चाब आठ रुपये सरसों तेल मिलता था

टेलीफोन विभाग से 2007 में रिटायर श्याम बाबू सनेही कहते हैं, एक वह दिन था, जब 10 में नयी-नयी नौकरी में आये थे। उस वक्त दरमाहा के नाम पर मात्र 175 रुपये मिलते थे। तब सभी खर्चे के बाद हर माह 75 रुपये बचा लेते थे। रसोई का सामान खरीदने जाते थे, तो कड़ुआ तेल आठ-नौ रुपये किलो, बढ़िया चावल ढाई रुपये और चना दाल तीन रुपये किलो मिलता था।ड्ढr आज तो रसोई के प्रयोग में नहीं आनेवाला तिसी तेल भी 66 रुपये किलो बिक रहा है। 2007 में जब रिटायर हो गये, तो पेंशन के रूप में 8000 रुपये मिल रहे हैं। लेकिन एक रुपया भी नहीं बच पाता है। 6000 रुपये किचेन के सामान पर खर्च होते हैं। शेष दो हाार रुपये रिक्शा भाड़ा से लेकर दवा-दारू में खत्म हो जाते हैं। अब नाई की दुकान को ही लीजिए। 70 के दशक में बाल-ढाढ़ी बनाने पर नाई को चार आने देने पड़ते थे। अब तो ‘इटालियन सैलून’ में भी 10-15 रुपये देने पड़ते हैं। अभी केवल सब्जी पर हर माह 1000 रुपये का खर्च हो रहा है। 70 के आसपास पांच रुपये में महीने भर की सब्जी आ जाती थी।ड्ढr 25 वर्ष से कचहरी के महतो होटल में काम कर रहे कौलेश्वर महतो की अलग व्यथा है। उनका कहना है कि हाारीबाग से वह काम की तलाश में 1में रांची आये थे। पांच सौ रुपये दरमाहा पर होटल में काम करना शुरू किया। तब सारा पैसा घर भेज देते थे। पत्नी दो से तीन सौ रुपये बचा लेती थी। लेकिन आज 1600 रुपये हर माह मिल रहे हैं। 1000 रुपया घर भेजते हैं, लेकिन घर का खर्च नहीं चलता है। बाल-बच्चे तो कभी-कभी गुड़-चुड़ा खाकर ही दिन गुजार देते हैं।ड्ढr महंगाई पर किसकी चलती है, कि हमारी चलेगी। हमलोग तो किसी तरह होटल में खाकर जीवन गुजार ले रहे हैं, लोकिन बाल-बच्चों के बार में सोचते हैं, नींद नहीं आती है। पिछले 25 साल से कचहरी चौक पर जूस बेच रहे शशिभूषण प्रसाद की तो दास्तान ही अलग है। महंगाई ने तो इनके निवाले पर ही डाका डाल दिया है। कहते हैं 10-82 में जब जूस बेचकर 100-150 रुपये कमाते थे, उस वक्त घरवाली 50 रुपया बचा लेती थी। आज भी 100-150 रुपये ही कमाते हैं। बचाने की बात तो दूर, दो वक्त की रोटी भी नहीं जुटा पा रहे हैं।

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