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सुख है हमार अंदर

सुख हमार अंदर है, बाहर खोजने से क्या फायदा है। हम पंचेदिं्रयों के विषयों में आनंद खोजते हैं। हम भीड़ में सत्य खोजते हैं। हमारी हालत उसी तरह है, जसे कोई सब्जी मंडी में रत्न खोजना चाहता है। उक्त बातें वर्धमान सागराी महाराज ने कही। श्री सागराी रविवार को हरमू रोड स्थित दिगम्बर जन भवन में श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि पंचेद्रिंयां जनित सुख स्थायी नहीं होती है। साधुओं की संगति से मोक्ष मिलती है। उन्होंने कहा कि जीवन में किसी को मारने का संकल्प नहीं लेना चाहिये। उसे मार या नहीं मार, दोनों ही स्थिति में मन में पाप का भाव आ ही जाता है। उन्होंने कहा कि साधुओं की संगति का प्राप्त होना अहोभाग्य है। रत्न तो जौहरी की दुकान में मिलेगा, अन्य स्थान में तुम क्यों ढूंढ़ते हो। श्री महाराज ने कहा कि गृहस्थ जीवन में चार तरह की हिंसा होती है। उन्होंने झारखंड के संदर्भ में कहा कि इस प्रदेश का नाम झारखंड होने के पीछे भी एक राज है। यहां पर आकर अनेकों जीवों ने अपने पाप रूपी कर्मो को झाड़ दिया है, नष्ट कर दिया है। आचार्य के प्रवचन के पूर्व आचार्य शांति सागराी महाराज की तसवीर पर सेवा सदन के अध्यक्ष राजकुमार केडिया, दासजी, छीतरमल जन, गामा सिंह ने माल्यार्पण कर श्रद्धासुमन अर्पित किये। मौके पर रखा पांडया ने मंगलाचरण एवं हेमंत सेठी ने भजन प्रस्तुत किया। दोपहर दो बजे आचार्य श्री संघ सहित सम्वेद शिखर की ओर निकल पड़े। जन श्रद्धालुओं ने आचार्य को विदाई दी। मंच का संचालन समाज के उपाध्यक्ष प्रदीप बाकलीवाल ने किया। आचार्य का रात्रि विश्राम का कार्यक्रम छोटानागपुर स्कूल बूटी मोड़ में होगा।ं

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